• ओवर रेटिंग के खेल में बड़के भैया बने सुपरमैन आबकारी मंत्री को क्यो बना दिया बैडमैन?

    wine.jpgआबकारी विभाग की टीआरपी इन दिनो टॉप पर है वजह है ओवर रेटिंग का खेल, राज्य के कई जिलो मे आबकारी विभाग ओवर रेटिंग का डमरू बजा रहा है। हर दिन लाखो की शराब की बिक्री पर जनता से ओवर रेटिंग का मोटा रुपया किसकी जेब में जा रहा है। देहारादून जिले का हाल तो और भी सुभान है, यहाँ जिले में तैनात बड़के भैया के पास तो किसी के सवाल का जबाब देने तक की फुर्सत नहीं है। वो तो सुपरमैन की भूमिका में आजकल दिख रहे है, जगह जगह छापेमारी हो रही है लाखो के माल पकड़े जा रहे है पर बड़के भैया सालभर तक आंख कान की मालिश मे व्यस्त थे। अब अचानक से मालिश के बाद सुपरमैन की भूमिका में है। आबकारी मंत्री के पास किसी भी बात का जबाब नहीं है, क्या उनकी शह पर बड़के भैया सुपरमैन की भूमिका मे है या फिर मंत्री जी को विभाग के कार्यो में दिलचस्पी नहीं है?

    इस समय आबकारी मंत्री क्यो मनमोहन सिंह बने हुये है? विभाग के 3 से 4 सुपरमैनो की हरकतों से मंत्री जी की बैडमैन छवि बनती दिख रही है?

    क्या उत्तराखंड की सरकार जीरो टोंलरेन्स की है या फिर सवालो के जबाबों के टोंलरेन्स की है?

    अगर इस विभाग के मंत्री जी ने जल्द ही अपनी चुप्पी ना तोड़ी तो उनपर प्रश्न चिन्ह लगना तय है।

    Read more
  • क्या देहारादून की कैंट विधानसभा सीट से तिलक करेंगे बेहड़ ?

    सूत्रो की माने तो “शेर ए तराई” की ख्याति प्राप्त और पूर्व स्वास्थ मंत्री तिलक राज बेहड़ देहारादून की कैंट विधानसभा सीट से अपनी ताल ठोक सकते है।

    हल्द्वानी और रुद्रपुर से विधायक रह चुके तिलक राज बेहड़, अब अपनी सीमा रेखा को बढ़ाकर देहारादून मे स्थापित करने के मंथनदौर मे है। अपनी काबलियत और स्वच्छ छवि के धनी बेहड़, देहारादून के लिए कोई नया नाम नहीं है। उन्हे बीजेपी और काँग्रेस दोनों के कार्यकर्ता बखूबी जानते और पहचानते है।

    देहारादून की कैंट सीट से आने वाले समय में कॉंग्रेस के कई दावेदार हो सकते है लेकिन कोई भी ऐसा स्थापित चेहरा ऐसा नहीं है, जो बीजेपी के वर्तमान विधायक को टक्कर दे सके। सात चुनाव लड़ चुके बेहड़ के पास अनुभव के साथ लोगो के बीच काफी लोकप्रिय भी है।

    अब बेहड़ के देहारादून स्थापित होने पर कॉंग्रेस और बीजेपी के नेताओ की “पेशानी” पर बल पड़ सकते है। ये तो आने वाला वक़्त बताएगा कि कितने अनाड़ी इस खिलाड़ी के सामने टिक पाएंगे।

    नूरा कुश्ती के माहिर खिलाड़ी बेहड़ क्या आने वाले वक़्त में कैंट विधान सीट से “तिलक” करेंगे या अभिषेक, इसका जबाब तो भविष्य की गर्द मे ही है।

    Read more
  • गच्च से बैठे और भच्च से गिर गये क्या?

    उत्तराखंड का दुर्भाग्य ये है की नेताओ और राजनीति हिलोरे भी मारती है और हिचकोले भी खाती है। सत्रह सालो में सिर्फ एक मुख्यमंत्री विकास और विश्वनीयता का प्रतीक रहा बाकी नेता अपने रिपोर्ट कार्ड मे फिस्सड्डी ही रहे, चाहे काँग्रेस हो या भाजपा दोनों ही प्रमुख दल के आलाकमान उत्तराखंड के मुख्यमंत्री चुनने मे फेल ही रहे।

    कोई भी टिकाऊ, भरोसेमंद, ईमानदार, और विश्वसनीय मुख्यमंत्री ना चुन पाया। इसे तो इस राज्य का दुर्भाग्य ही माना जाए।

    वर्तमान मुख्यमंत्री पर भी कुर्सी से रिहाई के लिए चीख पुकार करते विधायको का एक बड़ा समूह पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद रमेश पोखरियाल निशंक के दरबार जा पहुचा और खेवनहार निशंक से मदद की गुहार चाय पार्टी के दौरान लगा डाली।

    निशंक का मतलब होता है, “जिन्हे किसी बात की शंका और भय ना हो”! अब अगर इतने विधायको का समूह चीख चिल्ला रहा है, तो इसे वर्तमान मुख्यमंत्री का विधायको के प्रति नकारत्मक टोलरेंस ही माना जा रहा है।

    अब निशंक क्या इन लाचार विधायको के खेवनहार बन पाएंगे, ये तो आने वाला वक़्त तय करेगा।

    भाजपा के आलाकमान को अब तय करना चाहिए की मजबूत, सुशील, उपयुक्त एवं टिकाऊ भरोसेमंद कौन सा नेता है, जो आने वाले लोक सभा चुनाव और ये बार बार के विद्रोह से उनकी नैया पार लगा सके।

    फिर से पुनः ऐसा ना हो कि गच्च से बैठे और भच्च से भरभरा जाए।

    त्रिवेन्द्र रावत अगर राजनैतिक रूप से परिपक्व होते तो शायद ये स्थिती ना आती, उन्होने अपने इर्द गिर्द ऐसे लोग नियुक्त कर दिये जो सिर्फ बतोलों की घुट्टी बना कर पिलाने के महारथी है, चाहे उनके मीडिया सलाहकार हो उनके थिंक टैंक सिपेसलाहकारो की फौज, जो सिर्फ सत्ता की मौज ले रहे है उनका मुद्दो और उत्तराखंड जनता से कोई लेना देना नहीं है।

    उन जैसे सिपेसलाहकारो लिए तो कुछ शब्द है:-

    फूलो से जग आसान नहीं होता है..

    रुकने से पग गतिमान नहीं होता है..

    है नाश जहां निर्मम वही होता है..

    तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो...

    पग-पग में गति आती है,छाले छिलने से..

    तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो...

    मै ठुकरा सकू तुम्हें भी हँसकर..

    जिससे तुम मेरा मन मानस पाषाण करो॥

    जब संगत बुरी हो और मती भ्रस्ट हो जाए तो “डाकू रत्नाकर” बनते है और जब मार्गदर्शक और संगत अच्छी हो तो डाकू भी रत्नाकर से बाल्मीकी बनते है।

    उत्तराखंड को एक ऐसे ही बाल्मीकी की जरूरत है, जो इतिहास रचे अच्छाई, सच्चाई और कर्मठता से कार्य करने के लिए पंडित नारायण दत्त तिवारी जैसा उदाहरण हो।

    Read more
  • तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-खम, से हुआ गिल्ली डंडे का मैच

     

    cricket_match.jpg

    कभी कभी खोजी नारद के पाठक सोचते होंगे की ये कैसे-कैसे शब्द है जिनको समझने के लिए दिमागी कसरत करनी पड़ती है। खोजी नारद आप सभी की दिमागी इंद्रियो को कसरत कराता रहता है।

    तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-खम से एक गिल्ली डंडे का मैच हुआ, जिसमे करोड़ो रुपये अला..बला विभागो का खर्च हुआ जैसे खली के प्रोग्राम में करोड़ो की बलि ली गयी थी।

    अबकी बार कंपनी के मालिक का खून जंवा था तो तुर्रा ए पुर पेच ओ खम का सहारा लिया गया और प्रोग्राम का सफल आयोजन हुआ।

    विभागो के कई भाई लोगो ने तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-खम का काफी लुत्फ लिया और मौज बहार भी बटोर ली। इन विभागो के भाई लोगो के पास तो विभागीय भुगतान करने के लिए भी कौड़ी कौड़ी का टोटा है, अब गिल्ली डंडे के लिए कौन सा पेड़ हिलाकर निकाल दिये समझ मे नहीं आया पर ये जरूर पता लगा सबको तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-खम का कंधा दिया गया था, कुबेर की चाबी खोलने के लिए।

    अब सवाल ये है कि इतना सब किस लिए अरे भाई लोगो बे...काक का सहारा ले लेते। पूर्व वाले साहब ने भी सहयोग किया खूब पर उनको तो ना सिरा पता चला ना छोर, अब अंदर से आवाज आ रही है उनके,

                          खुदा के वास्ते पर्दा ना उठा काबे का जालिम

                       कही ऐसा न हो यंहा भी कि वही काफ़िर सनम निकले

    अब आप सभी अपने दिमाग को जोरदार कसरत करवाए और जब तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-खमका पता चले तो फ़ेस....पर जरूर बके। ताकि विभागो के भाई लोग सतर्क हो जाए।

    Read more
  • विकास के पहिये में “सुआ” लेकर पंक्चर करते सलाहकार

    advisor.jpg

    देहारादून। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत जब से उत्तराखंड राज्य में बीजेपी के डबल इंजन की सरकार के सेनापति बने है, तब से कुछ लोगो के गले में बांस के रूप में फंसे पड़े है, ना कुछ खाते बन रहा है और ना कुछ निगलते। अब ऐसे लोगो ने एक रणनीति के तहत अपने कुछ लोगो को त्रिवेन्द्र रावत जी के खेमे मे घुसा दिया। अब वही लोग मुख्यमंत्री के अच्छे कर्मो का “कांड” करने में लगे हुये है। सब किए कराये पर ऐसे लोग लोटा लेकर पानी डालने के काम में जुटे हुये है। अब मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत क्या करे? उनकी आंखो पर ऐसे सलाहकारो ने सिपली इलम वाला जादू कर ऐसा मायाजाल बुन रखा है कि उनको भी राज्य में अच्छे दिन नज़र आ रहे है।

    अभी 4 दिन पहले इन्वेस्टर सम्मिट सम्पन्न हुया सब कुछ बढ़िया चल रहा था राज्य हित में, पर एक विडियो ने बड़ा “कर्मकांड” करवा दिया। अब इस वाइरल विडियो के कारण ऐसी मट्टी पलीद हो रही है कि ना त्रिवेन्द्र जी को उगलते बन रहा है और ना थूकते। विपक्ष ने भी वाइरल विडियो पर तरकश से तीर निकाल कर बौछार शुरू कर दी है।

    गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने को लेकर111 दिनों से अनशन कर रहे वयोवृद्ध पर्यावरणविद एवं वैज्ञानिक प्रो. जीडी अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) का गुरुवार (11 अक्टूबर) दोपहर को निधन हो गया। उन्हें बुधवार को हरिद्वार प्रशासन ने ऋषिकेश के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया था। जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी सानंद ने ऋषिकेश के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में प्राणों की आहुति दे दी। स्वामी सानंद ने नौ अक्टूबर से जल भी त्याग दिया था। वह गंगा की अविरलता और निर्मलता को लेकर तपस्यारत थे।

    अब त्रिवेन्द्र सिंह रावत खुद मुख्यमंत्री बनने से पहले नमामि गंगे के राष्ट्रीय संयोजक रहे है, क्या आपको इतना ज्ञान भी ना था कि गंगा पर कानून बनाने के लिए गंगा पुत्र 111 दिनो अनशन पर है और आप उनका अनशन ना तुड़वा सके, उनको मना ना सके। क्या आपके उत्कृष्ट सलाहकार ने आपको इतनी छोटी सी सलाह ना दी?

    खैर छोड़िए मै एक बात भूल गया था कि सलाहकार महोदयो को सिर्फ लोटा लेकर पानी डालना आता है।

    अब मुख्यमंत्री जी आप अपने विकास के पहिये को ऐसे सलाहकारो के दम पर चलायेंगे तो वो इसमें सुआ लेकर पंक्चर ही करेंगे और आपको बोलेंगे कि पहिये में कंकड़ फ़स गया था, वही निकाल रहा था। आपको मानना भी पड़ेगा क्यूकि अच्छे दिन वाला चश्मा जो पहना रखा है।

    त्रिवेन्द्र सिंह रावत जी अच्छे "कर्म" करने से कुछ हासिल ना हो रहा हो तो "सलाहकारो का कांड" कर दीजिये, नहीं तो यही सलाहकार जो विभीषण बने हुये है वो आपकी सरकार का “कर्मकांड” करवाकर ही मानेंगे।

    आपको सिर्फ इतना जी कहना है किसंसार के प्रति हमारा ज्ञान उन शब्दों में सीमित है जिन्हें हम जानते हैं। जितने अधिक शब्दों को हम जानेंगे हमारासंसार उतना ही बड़ा होगा,उतना ही बड़ा हमारा कुआं भी होगा। सूचना क्रांति का धन्यवाद जिसके कारण हमअधिक स्थानोंऔर सूचनाओको देख सकते हैं और अधिक शब्दों को जान सकते हैं लेकिन समय अभी भी एक बंधन है। हम अभीभी कुएं के मेंढक हैं।

    कूपमंडूक कुएं से बाहर बाहर निकल सकता है लेकिन वह अपने को दूसरे कुएं में पाएगा,ऐसे कुएं में जहां दीवारक्षितिज से बनी है,वो कभी क्षितिज से मुक्त नहीं हो सकता है।

     कुएं की दीवार और क्षितिज की परिधि दोनों चक्र या पहिए की तरह आकार वाली हैं। एक चक्रवर्ती वो होता है जोस्वंय को ब्रह्मांड का अधिपति कहता है लेकिन वास्तव में एक कूपमंडूक ही है,क्योंकि उसका शासन उसके क्षितिजकी सीमाओं में बंधा है। इससे बाहर उसका कोई नियंत्रण नहीं है।

    लेकिन हम अपने क्षितिज और कुएं के आकार को बढ़ा सकते हैं। इसके लिए हमें हमारे ज्ञान को बढ़ाते हुए औरअपनी समझदारी को विस्तृत करते हुए विकास करना होगा। हमें और लोगों से जुड़ना होगा,उनके कुओं का पताकरना होगा और यह भी पता लगाना होगा कि उनके कुएं हमें विस्तृत या संकुचित बनाएंगे।

    ऐसे सलाहकार जिनकाप्रारब्धही कुछ अलग है और उन्होने आज तक पूर्व में भी आपकी खिल्ली उड़वाने का कोई मौका ना छोड़ा हो, उनसे दूरी बनाए, और धरातल पर उतरकर राज्य हित मे कार्य करे। "खोजी नारद" और "जनमत टुडे" आपको जल्द ही ऐसे सलाहकारो और विभीषणों का असली चेहरा दिखाएंगे। क्यूकि ऐसे विभीषणों पर खोजी नारद उसखम्बे तरह है, कि हरकुत्ता जो है, वो टांग पे टांग टिकाये फूटपाथ पे लेटे-लेटे सामने लगेखोजी नारद रूपीखम्बे को घूर रहा हैक्यूकिइस खम्बे ने हीपूर्व में भीउसकी धार से उसी को करंट दे दिया था।

    Read more
  • समाचार पत्र के कार्यालय में लगी आग, कोई अपशगुन तो नहीं

     

    river_final.jpg

    देहारादून।कल शाम एक दैनिक समाचार पत्र के कार्यालय मे सर्वर रूम में शॉट सर्किट हो जाने से आग लग गयी, कोई जनहानि नहीं हुई सभी पत्रकार बंधु और कर्मचारी सुरक्षित है।

    चूंकि मै खुद पत्रकारिता के क्षेत्र से हूँ इसलिए बारीकी से खबर पर नजर रखता हूँ। कल उसी दैनिक समाचार पत्र में एक विज्ञापन छपा था फ्रंट पेज पर, एक बिल्डर द्वारा अपने फ्लैट बेचने हेतु विज्ञापन दिया गया था। ये वही बिल्डर है जिनको 13 अप्रैल 2018 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता आज़ाद अली की याचिका के बाद नोटिस जारी हुआ है। कुछ माह पूर्व जब हाईकोर्ट उत्तराखंड मे याचिकाकर्ता द्वारा याचिका कोर्ट में दायर की गयी थी, तब भी कई दैनिक समाचार पत्रो में विज्ञापनो की भरमार थी।

    सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में नदी की भूमि पर पट्टे आवंटित करना और फिर उसको भूमिधर करने के साथ-साथ उत्तराखंड सरकार के ज़ी.ओ. का हवाला भी है।

    जो हाई कोर्ट उत्तराखंड के आदेश पर 04-07-2013 जनहित रिट संख्या-233/2008 में उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी किया गया था, जिसमे 2 आदेश साफ साफ किये गए थे:-

    1   1- किसी भी निर्माण कार्यो के लिए नदी श्रेणी में दर्ज भूमि पर अग्रिम आदेशो तक प्रस्तावित ना किया जाये।

          2-अग्रिम आदेशो तक नदी श्रेणी में दर्ज किसी भी भूमि पर निर्माण किए जाने की अनुमति ना दी जाये।

    अब जब सरकार द्वारा जी.ओ. जारी हो गया था तब बिल्डर द्वारा मानचित्र कैसे स्वीकृत कैसे करवा लिया गया और प्राधिकरण ने कैसे मानचित्र स्वीकृत कर दिया।

    खैर अब मुद्दे की बात तो ये है कि नदी के नाम पर राजनीति करने वाले सत्ता के शीर्ष पर तो जरूर पहुंचे पर अर्श से फर्श पर कब आए पता न चला। हमारे राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत जी भी गंगा से जुड़े हुये है, नमामि गंगे के राष्ट्रीय संयोजक भी रहे है।

    नदियो का दोहन उनके राज्य में ज्यादा हो रहा है और नदियां जो सभी मनुष्य एवं जानवरो के जीवन का अति महत्वपूर्ण हिस्सा है वो त्रिवेन्द्र रावत जी को अगाह कर रही है कि अभी भी वक़्त है हमे बचा लो। त्रिवेन्द्र जी संवेदनशील व्यक्तिव के धनी भी है और नदियो के महत्व को बखूबी समझते भी है। अब नदियो को कैसे भूमाफियाओ द्वारा बचाना है उनके रुख को सभी आने वाले समय में देखेंगे।

    मीडिया का आम आदमी के जीवन में भी महत्वपूर्ण योगदान है, लोग आज भी मीडिया को अपने जीवन का महत्वपूर्ण अंग मानते है। हम अगर सच से परे हो जाएँगे तो फिर प्रकृति हमे अगाह करती ह। विज्ञापन लेना और देना दोनों गुनाह नहीं है पर अपनी किसी गलती और गुनाह पर पर्दा डालने के लिए विज्ञापन का सहारा देना और लेना दोनों ही गुनाह है और प्रकृति हमे कुछ ना कुछ अंदेशा जरूर देती है जिसे हम अपशगुन का नाम देते है।

    अगर नदियां ही ना बची तो व्यक्ति अपनी जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता है, किसी का जीवन बचाना बहुत बड़ा उपकार होता है और सभी के जीवन से जुड़ी हुई नदियो को बचाना बहुत बड़ा परोपकार है साथ में हमारा ही कर्तव्य भी है। कोई भी अगर सभी के जीवन से खिलवाड़ करेगा तो प्रकृति भी हमसे खिलवाड़ करेगी। तब हम चाह कर भी खुद को बचा नहीं पाएंगे।

    Read more

Photo Gallery