• "डाबर" का तेल और MDDA का मेल, गज़ब हो रहा खेल!

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    देहारादून। जब बच्चे छोटे होते है तो माँ बच्चे की हड्डियों को मजबूत करने के लिए डाबर का तेल लगाती है । उत्तराखंड की राजधानी देहारादून में भी मसूरी देहारादून विकास प्राधिकारण मे डाबर का तेल खूब चर्चा का केंद्र बन रहा है । एमडीडीए के आला अधिकारियो पर डाबर के तेल की ऐसी मालिश हुई कि उन्होने अपनी हड्डियों को बचाने के लिए एक बिल्डिंग का मानचित्र स्वीक्रत कर दिया। मुख्यमंत्री कार्यालय से महज 500 मीटर पर एक बिल्डिंग के कम्पौंडिंग मानचित्र को मंजूरी दे दी गयी जो नियमो को ताक पर रखकर बना है। पूरे उत्तराखंड में माननीय हाईकोर्ट के निर्देश पर अवैध अतिक्रमण पर प्रशासन और एमडीडीए ने अभियान छेड़ रखा है, और अगर कोई महज एक शपथ पत्र के आधार पर अपना अवैध मानचित्र शमन करवा ले और प्राधिकारण के आला अधिकारी उसके बाद डाबर के तेल से मालिश करवा अपनी आंखे मूद कर सो जाए तो उसे क्या कहा जाएगा।

    ये तो शोले की बसंती वाली बात हो गयी कि हमे बकबक करने की आदत भी नहीं है और नियम के अनुसार शपथ पत्र ले लिया है अगर उक्त प्रकरण से संबन्धित प्राधिकारण को कोई शिकायती पत्र मिलेगा तो कार्यवाही जरूर होगी। इस टाइप के बयान आपको समाचार पत्रो में और न्यूज़ चैनल में प्राधिकरण के आला अधिकारियों के सुनने को मिलते रहते होगे। केष्टो मुखर्जी का नाम तो आप जानते होंगे? प्राधिकरण के एक आला अधिकारी भी केष्टो मुखर्जी के अवतार मे है चंपी तेल और मालिश? सर तो तेरा चकराय या दिल डूबा जाए, आजा प्यारे पास हमारे, काहे घबराए?

    अबकी बार कुछ अलग होगा क्यूकि इस आला अधिकारी पर ऐसा शोध हुआ है जिससे आप सभी अवगत होना चाहेंगे। एक कंपनी जिसकी फ़ाइल गुम होने की रिपोर्ट भी दर्ज कारवाई जाती है और उसके बाद जांच को प्रभावित भी किया जाता है, क्या है पूरा मामला जल्द आपको खोजी नारद अवगत करवाएगा?

    फिलहाल दीगर बात ये है कि डाबर का ऐसा कौन सा तेल है जिससे प्राधिकरण के अधिकारियों की जमकर मालिश हुई है? यह मालिश किस सफेदपोश ने की और उत्तराखंड के ईमानदार हाकिम किसकिआँख कि किरकिरी बने हुये है? पूरी खबर जल्द आपके समक्ष।

    सूत्रो की माने तो प्राधिकरण के दो आला अधिकारी उत्तराखंड के हाकिम के रडार पर है जिन पर कार्यवाही जल्द होनी है और अगर ऐसा होता है तो भ्रस्टाचार पर जरूर लगाम लगेगी ।

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  • उत्तराखंड की “हैरान गली” “परेशान मोहल्ला” क्यो हो रहा त्रिवेन्द्र सिंह रावत के खिलाफ हो हल्ला?

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    उत्तराखंडके मुख्यमंत्रीत्रिवेन्द्र सिंह रावतके खिलाफ बहुत सारी खबरें, आपको उनके शपथ लेने के बाद देखनेको मिलीहोंगी। उत्तराखंड का दुर्भाग्य है कि की शपथ लेने के बाद मुख्यमंत्रीके हटने की चर्चा जोर पकड़ लेती हैं। एक ऐसा तपका है जो हमेशा सेउत्तराखंड की प्रति नकारात्मक रुख अपनाता रहा है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्रीत्रिवेंद्र रावत के खिलाफ विगत कुछ माह से सोशल मीडियामेंएवं न्यूज़ पोर्टलपत्रिकाओंके जरिये,गाहेबगाहेत्रिवेंद्र सिंह रावत को घेरा जाता रहा है इसीक्रम में खोजी नारद आज कुछ खुलासा कर रहा है कि कितनी हैरान गलियें है औरपरेशान मोहल्ले हैं जो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के खिलाफ सिर्फ सोशलमीडिया पर अपनी भड़ास औरहो-हल्ला करअपने मंसूबों को अंजाम देने में लगे हैं।

     

    मुख्यमंत्री के सलाहकार ऐसे हैं जो खुद ही मुख्यमंत्री के खिलाफ खबरेंप्लांट करवाते हैं और उनको मैनेज करने का खेल करते हैं यह सारा नंबर गेम है,ऐसा लोगों को लगता है पर इसके पीछे एक बहुत बड़ी रणनीति काम कर रही है।जिसके तहत कुछन्यूज़ पोर्टल जो उत्तराखंड में बदनामी का दामन थामे हुए हैंउनको ठेके दिए जाते हैं उत्तराखंड के हाकिम के खिलाफ खबरेसोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए औरफिरउन्ही खबरों को रोकने के लिए, उनको मैनेज किया जाता है। “मैंनेज” इसका मतलबआप समझ रहे होंगे कि मैं क्या कहना चाह रहा हूं।

    एकसा न्यूज़ पोर्टल जो हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है जिसका काम सिर्फ औरसिर्फ ब्लैक मेलिंग रहा हो अब वह मुख्यमंत्री के पक्ष में लिखेंगे क्योंकिडील हो चुकी है। अब अगरपोर्टल वाले कहेंगे कि डील नहीं हुई है और हम ऐसेनहीं हैं तो उसके जवाब मेंउनकी पुरानी करतुतो की क्लिप आज तक यू ट्यूब पर इनको तमाचे मार रही है।

     

    सोशल मीडिया पर खबरे पोस्ट करने वाले पोर्टल द्वारा पूर्व के वर्षो में कई साजिशों को अंजाम दिया गया है एक मामला कुछ यू था किकिसी पढे लिखे व्यक्ति को चंद पैसो की खातिर उसका कार्य करने से रोकने के लिए उसके अधिकारी आईएएस दोस्त द्वारा इस पोर्टल के संपादक को ठेका दिया गया था। ताकि तात्कालिक मुख्यमंत्री को भी खुश किया जा सके और एक करीबी दोस्त को छुरा घोपकर मरहम भी लगाया जा सके, ताकि दोस्त को ये लगे कि मेरा आईएएस अधिकारी दोस्त कितना ख्याल रखता है मेरा। तब उस संपादक के मुखबिरो ने खोजी नारद को भी मुखबिरी की और उसका परिणाम खबर और विडियो के रूप में आपके सामने पूर्व में आ चुका है।

     

    अबएक न्यूज़ पोर्टल द्वारा सोशल मीडिया पर खबरेमुख्यमंत्री के पक्ष में लिखी जाएंगी क्योंकि डील हो चुकी है खबर लिखवाने वाला अब मैनेज का खेल कर रहा है। इसे तो यही कहा जाएगा कि “चिराग तलेअंधेरा”, मुख्यमंत्री जैकेट बदलते हैं और यह खबर1घंटे बाद सोशल मीडिया परस पोर्टल के द्वारा पोस्ट करी जाती है इसे क्या कहा जायेगा?

     

    जीरो टालरेंस की सरकार का विजन बिलकुल साफ है, उसके लिएमुख्यमंत्री जी मैं तो आपसे यह कहना चाह रहा हूं किआपकोअपने आसपास साफ सफाई करलेनी चाहिए क्योंकि अगर गंदे लोग आस पास रहेंगे तो वह अच्छे लोगों को भीगंदा कर देंगे।क्योकिएक अदना सा सलाहकार इतना सब कुछ कर गया और आपको हवा भी नहींलगी, क्योंकि आप भोले हैं।

    चाहे उत्तरा बहुगुणा पंत वाला प्रकरण हो या उस पहाड़ी गीत वाला, सबसे ज्यादा थू-थू सरकार की करने में किसकी भूमिका थी? आप खुद में सक्षम में बस इनके घेरे से निकल कर जो आप कार्य कर रहे है वोकीजिये। वरना ये आपके हर अच्छे कार्य को पलीता बनाकर उसमे खुद ही आग लगाने का कार्य करेंगे और खुद यही प्रदर्शित करेंगे कि मै तो पानी समझ कर बाल्टी लाया था आग पर डालने के लिए, मुझे क्या पता उसमे पेट्रोल था। अप्रिय सलाहकार को एक कवि द्वारा लिखी गयी कुछ पंक्ति उनके मुँह पर फेक रहा हूँ:

    प्रतिमाओं में पूजा उलझी
    विधियों में उलझा भक्ति योग
    सच्चे मन से षड्यंत्र रचे
    झूठे मन से सच के प्रयोग
    जो प्रश्नों से ढह जाए वो
    किरदार बना कर क्या पाया?
    जो शिलालेख बनता उसको
    अख़बार बना कर क्या पाया

     

    त्रिवेन्द्र जी आप अच्छा विजन और जीरो टालरेंस के साथ आगे बढ़े उत्तराखंड के विकास के लिएकुछ ऐसे लोगों से जुड़िएऔर जोड़िये जोनिष्पक्ष होकर इमानदारी से उत्तराखंड के लिए कुछ करना चाहते हो वरना ऐसेलोग और ऐसे सलाहकारो ने तो पूर्व की सरकारों की भीलुटियाडुबो दीथी

     

     

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  • क्या देहारादून की कैंट विधानसभा सीट से तिलक करेंगे बेहड़ ?

    सूत्रो की माने तो “शेर ए तराई” की ख्याति प्राप्त और पूर्व स्वास्थ मंत्री तिलक राज बेहड़ देहारादून की कैंट विधानसभा सीट से अपनी ताल ठोक सकते है।

    हल्द्वानी और रुद्रपुर से विधायक रह चुके तिलक राज बेहड़, अब अपनी सीमा रेखा को बढ़ाकर देहारादून मे स्थापित करने के मंथनदौर मे है। अपनी काबलियत और स्वच्छ छवि के धनी बेहड़, देहारादून के लिए कोई नया नाम नहीं है। उन्हे बीजेपी और काँग्रेस दोनों के कार्यकर्ता बखूबी जानते और पहचानते है।

    देहारादून की कैंट सीट से आने वाले समय में कॉंग्रेस के कई दावेदार हो सकते है लेकिन कोई भी ऐसा स्थापित चेहरा ऐसा नहीं है, जो बीजेपी के वर्तमान विधायक को टक्कर दे सके। सात चुनाव लड़ चुके बेहड़ के पास अनुभव के साथ लोगो के बीच काफी लोकप्रिय भी है।

    अब बेहड़ के देहारादून स्थापित होने पर कॉंग्रेस और बीजेपी के नेताओ की “पेशानी” पर बल पड़ सकते है। ये तो आने वाला वक़्त बताएगा कि कितने अनाड़ी इस खिलाड़ी के सामने टिक पाएंगे।

    नूरा कुश्ती के माहिर खिलाड़ी बेहड़ क्या आने वाले वक़्त में कैंट विधान सीट से “तिलक” करेंगे या अभिषेक, इसका जबाब तो भविष्य की गर्द मे ही है।

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  • क्या बिना नोटो के देहारादून RTO में घुसना एक जंग है?

     

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    उत्तराखंड की राजधानी देहारादून केRTO ऑफिस में अधिकारी और कर्मचारी सभी बड़ी बेबाकी और कर्मठता से कार्य करते है वो भी सिर्फ धनिया पुदीने अलग से उगाने के लिए, ईमानदारी तो ऐसी कूट-कूट कर भरी है कि वहाँ जाने वाली पब्लिक भी गश खाकर गिर जाये।

    RTO ऑफिस मे मौजूद दल्ले जो बड़ी बड़ी गाड़ियो मे आते है और अपनी दुकान खोल छाती चौड़ी कर मोटी रकम दलाली की लेते है।

    RTO ऑफिस के परिसर मे जनता तो कम, ये दल्ले ज्यादा घूमते है और मिनट से पहले काम 35 कर जेब पर डाका डाल देते है।

    ऐसा क्यो होता है हम बताते है, आरटीओ से संबन्धित कार्य के लिए जब लोग कार्यालय में जाते है तो उन्हे बताने वाला कोई नहीं होता कि उनका काम किस तरीके और नियम से होगा। पूछताछ केंद्र पर बताने वाला कोई नहीं होता। किसी भी कर्मचारी से कुछ पूछो तो वो ऐसे बात करता है जैसे वो कुछ बोल कर हम पर एहसान कर रहा हो।

    अगर आप देहारादून के “एआरटीओ” के ऑफिस तक पहुँच गए अपनी मनुहार लेकर तो वहाँ पर मौजूद दरबान तुरंत कहता कि साहब मीटिग में है।

    दल्लों की मंडली के कुछ किरदार जो तीसरी आँख मे कैद हुये है जरा विडियो को

    गौर से सुने और देखे।

    क्लिक करे विडियो देखने के लिए :-https://youtu.be/MQshfuhZyv4

    फिलहालARTO अरविंद पाण्डेय इन दल्लों पर लगाम लगाने और अपने कर्मचारियो को तमीजदार बनाने में नाकाम साबित हो रहे है। जब विभाग के मंत्रीमहोदय से हमने बात करने की कोशिश की तो कई बार फोन लगाने के बाद भी उनका फोन नहीं उठा।

    मुख्यमंत्री कार्यालय में जब फोन किया गया तो तुरंत फोन भी उठा और जल्द ही पूरे मामले को संज्ञान लेकर उचित कार्यवाही की बात की गयी।

    अब जब विभाग के मंत्री और अधिकारी ही फोन नहीं उठाते तो काम कैसे करते होंगे उसका तो भगवान ही मालिक है।

    एक ड्राइविंग लर्निंग लाईसेन्स बनवाने की फीस 220 रुपये है और लाईसेन्स बनवाने की फीस लगभग 600 रुपये है।RTO मे बैठे दलाल आपसे 3500 रुपये लेते है। इन दलालो पर अंकुश तभी लग सकता है जब वहा के अधिकारी ईमानदार हो। आप विडियो देखे और खुद निर्णय ले।

    उत्तराखंड के ईमानदार मुख्यमंत्री से ऐसे अधिकारियों और मंत्रियो को सबक लेना चाहिए कि अपनी कार्य शैली को कैसे ठीक करे और इस दलाली की प्रथा को कैसे बंद करे।

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  • गच्च से बैठे और भच्च से गिर गये क्या?

    उत्तराखंड का दुर्भाग्य ये है की नेताओ और राजनीति हिलोरे भी मारती है और हिचकोले भी खाती है। सत्रह सालो में सिर्फ एक मुख्यमंत्री विकास और विश्वनीयता का प्रतीक रहा बाकी नेता अपने रिपोर्ट कार्ड मे फिस्सड्डी ही रहे, चाहे काँग्रेस हो या भाजपा दोनों ही प्रमुख दल के आलाकमान उत्तराखंड के मुख्यमंत्री चुनने मे फेल ही रहे।

    कोई भी टिकाऊ, भरोसेमंद, ईमानदार, और विश्वसनीय मुख्यमंत्री ना चुन पाया। इसे तो इस राज्य का दुर्भाग्य ही माना जाए।

    वर्तमान मुख्यमंत्री पर भी कुर्सी से रिहाई के लिए चीख पुकार करते विधायको का एक बड़ा समूह पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद रमेश पोखरियाल निशंक के दरबार जा पहुचा और खेवनहार निशंक से मदद की गुहार चाय पार्टी के दौरान लगा डाली।

    निशंक का मतलब होता है, “जिन्हे किसी बात की शंका और भय ना हो”! अब अगर इतने विधायको का समूह चीख चिल्ला रहा है, तो इसे वर्तमान मुख्यमंत्री का विधायको के प्रति नकारत्मक टोलरेंस ही माना जा रहा है।

    अब निशंक क्या इन लाचार विधायको के खेवनहार बन पाएंगे, ये तो आने वाला वक़्त तय करेगा।

    भाजपा के आलाकमान को अब तय करना चाहिए की मजबूत, सुशील, उपयुक्त एवं टिकाऊ भरोसेमंद कौन सा नेता है, जो आने वाले लोक सभा चुनाव और ये बार बार के विद्रोह से उनकी नैया पार लगा सके।

    फिर से पुनः ऐसा ना हो कि गच्च से बैठे और भच्च से भरभरा जाए।

    त्रिवेन्द्र रावत अगर राजनैतिक रूप से परिपक्व होते तो शायद ये स्थिती ना आती, उन्होने अपने इर्द गिर्द ऐसे लोग नियुक्त कर दिये जो सिर्फ बतोलों की घुट्टी बना कर पिलाने के महारथी है, चाहे उनके मीडिया सलाहकार हो उनके थिंक टैंक सिपेसलाहकारो की फौज, जो सिर्फ सत्ता की मौज ले रहे है उनका मुद्दो और उत्तराखंड जनता से कोई लेना देना नहीं है।

    उन जैसे सिपेसलाहकारो लिए तो कुछ शब्द है:-

    फूलो से जग आसान नहीं होता है..

    रुकने से पग गतिमान नहीं होता है..

    है नाश जहां निर्मम वही होता है..

    तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो...

    पग-पग में गति आती है,छाले छिलने से..

    तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो...

    मै ठुकरा सकू तुम्हें भी हँसकर..

    जिससे तुम मेरा मन मानस पाषाण करो॥

    जब संगत बुरी हो और मती भ्रस्ट हो जाए तो “डाकू रत्नाकर” बनते है और जब मार्गदर्शक और संगत अच्छी हो तो डाकू भी रत्नाकर से बाल्मीकी बनते है।

    उत्तराखंड को एक ऐसे ही बाल्मीकी की जरूरत है, जो इतिहास रचे अच्छाई, सच्चाई और कर्मठता से कार्य करने के लिए पंडित नारायण दत्त तिवारी जैसा उदाहरण हो।

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  • जीन्स के बाहर अंडरवियर प्लांट करने वाला अधिकारी

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    आजकल के फैशन के हिसाब से लोग आजकल जीन्स के बाहर अंडरवियर दिखाते है, चड्डी अगर महंगी कंपनी की है तो ज्यादा बाहर मुह निकाल लेती है। इसके उलट उत्तराखंड की राजधानी देहारादून में एक ऐसा प्राधिकरण भी है जो इसके उलट काम करता है।

    अंडरवियर अगर महंगी है तो हाई वेस्ट जीन्स पहना देता है और अगर लो क्लास या मीडियम क्लास है तो ऐसे उधेड़ता है कि आम आदमी अंडरवियर छोड़ भाग ले।

    प्राधिकरण के अधिकारी बयान तो ऐसे देते है जैसे पुराने समय लोग पिक्चर देखते हुये चिल्लर फेकते थे। सफेदपोश और रसूखदार लोगो को तो ऐसे ट्रीट किया जाता है जैसे नया-नया दामाद घर आया हो।

    एक अधिकारी के संरक्षण में टोंस नदी का रुख मोड़कर नियमो के विपरीत वहाँ पर आलीशान होटल का निर्माण किया जा रहा है।

    रिजर्व ग्रीन फॉरेस्ट में प्राधिकरण के राज ज्योतिष ने रिज़ॉर्ट/आश्रम बनवा दिया और दिखाने की कार्यवाही के नाम पर नोटिस काट कर इतिश्री कर ली।

    सचिवालय से महज़ 500 मीटर पर कितना बड़ा अवैध निर्माण कार्य चल रहा है और प्राधिकरण के अधिकारी बोलते है कि नोटिस काट दिया है और वाद चल रहा है, उस अवैध निर्माण को रोकने का काम कौन करेगा ?

    धोरणखास में लगभग 25 बीघा में दो बिल्डरों ने अवैध प्लाटिंग कर दी और उसमे से एक हरियाणा का बिल्डर है और प्राधिकरण ने  नोटिस काट कर इतिश्री कर ली। वहाँ पर काम कौन रोकेगा ?

    प्राधिकरण के गूंगे बहरे अधिकारियों सरकार आपको सैलरी देती है और आप क्या करते है? सरकार को कोर्ट के कटघरे मे खड़ा करते है।

    सिर्फ आप जैसे निर्लज्ज अधिकारियों की वजह से सरकार के कामो पर कोर्ट को हस्ताक्षेप करना पड़ता है और ये फजीहत का कारण कौन है?

    सरकार के मुखिया अब मूड मे आ गए है, अभी देखा ना टेलर एनएच74 वाला। सरकार के मुखिया को तो पूरे प्राधिकरण का अंकेक्षण करवाना चाहिए। ताकि कितना लपोड़ के घी कौन-कौन घर ले गया है उसकी भी पिक्चर रिलीज़ हो और तब जनता तुम्हारी पिक्चर देख चिल्लर उछाले।

    जीरो टालरेंस की सरकार के मुखिया जल्द ही ऐसे भ्रस्ट अधिकारियों की जीन्स और अंडरवियर दोनों उतार कर उनके पिछवाड़े पर संटी बजाने वाले है ताकि भ्रस्टाचार पर लगाम लगे और भ्रस्टाचारियों को सबक मिले ।

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  • लालू के RJD परिवार में फूंट!

     

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    बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू यादव के बेटे तेज प्रताप के कुछ ट्वीट्स ने राज्य की राजनीति में एक नई चर्चा शुरू कर दी है। तेज प्रताप ने एक ट्वीट के जरिए यह कहने की कोशिश की है कि वह राजनीति से संन्यास ले सकते हैं और 'सबकुछ' अपने भाई तेजस्वी के हाथों में सौंप सकते हैं।

    बाद में इसी मुद्दे पर बात कहते हुए तेज प्रताप ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर आरोप लगाते हुए कहा, 'पार्टी के लोग मेरा फोन नहीं उठाते हैं और कहते हैं कि उन्हें ऐसा करने के लिए वरिष्ठ नेताओं की ओर से कहा गया है। मेरे और मेरे भाई के बीच में कोई मतभेद नहीं है। हमें उन तत्वों को पार्टी से निकालना होगा, जो हमें तोड़ना चाहते हैं। मैं चाहता हूं कि सीनियर नेता ऐसे लोगों को पहचानें और उनको बाहर करें।'

    'असामाजिक तत्वों को पार्टी से निकालना होगा'
    तेज प्रताप ने मीडिया से बात करते हुए यह भी कहा, 'हमें असामाजिक तत्वों को पार्टी से निकालना होगा। राजेंद्र पासवान जैसे लोगों ने हमारे लिए मेहनत की है। जब मैंने लालू जी, राबड़ी जी और तेजस्वी को कहा तब उन्हें पद दिया गया। यह सब इतनी देरी से क्यों किया गया?'

    दरअसल, तेज प्रताप ने एक ट्वीट में लिखा, 'मेरा सोचना है कि मैं अर्जुन को हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठाऊं और खुद द्वारका चला जाऊं। अब कुछएक 'चुगलों' को कष्ट है कि कहीं मैं किंगमेकर न कहलाऊं।' तेज प्रताप के इस ट्वीट से कयास लगाए जा रहे हैं कि उनके और तेजस्वी के बीच कुछ गड़बड़ चल रही है।

    तेजस्वी को बताया कलेजे का टुकड़ा
    तेजस्वी के बारे में बोलते हुए तेज प्रताप ने कहा, 'वह मेरे कलेजे का टुकड़ा है। असामाजिक तत्वों की कोशिश है कि भाई-भाई को लड़वाने की। उनकी कोशिश है कि पार्टी को तोड़ो, लालू यादव को तोड़ों लेकिन हम कभी ऐसा होने नहीं देंगे। वरिष्ठ नेताओं को चाहिए कि ऐसे लोगों को चिह्नित करें और उनको बाहर निकालें।'

    'तोड़ने वालों से सावधान रहना जरूरी'
    हालांकि, तेज प्रताप ने एक और ट्वीट किया है और कहा है कि उनकी पार्टी को एकता में सेंध लगानेवालों से बचना चाहिए। उन्होंने लिखा, 'आरजेडी और गठबंधन सहयोगियों के सामने 2019 के लिए एक नई सरकार बनाने की बड़ी जिम्मेवारी है लेकिन हमें उन असामाजिक तत्वों से सावधान रहना है, जो इस एकता में सेंध लगाना चाहते हैं। जय भीम, जय बहुजन, जय मंडल, जय हिंद।' आपको यह भी बता दें कि जिस अकाउंट से ये ट्वीट्स किए गए हैं, वह वेरिफाइड अकाउंट नहीं है।

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  • शिवसेना की तरफ से PM उम्मीदवार होंगे प्रणव!

     

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    एनडीए की अहम सहयोगी शिवसेना ने शनिवार को कहा कि 2019 के आम चुनाव में अगर बीजेपी पूर्ण बहुमत पाने में असफल रहती है तो पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री पद के सर्वामान्य उम्मीदवार हो सकते हैं।

    इसके साथ ही उन्होंने पूर्व शिवसेना अध्यक्ष बाला साहेब ठाकरे को कभी भी मंच पर नहीं बुलाने और इफ्तार पार्टियों के आयोजान के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर निशाना साधा।

    शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में यह टिप्पणी गुरूवार को प्रणब मुखर्जी के आरएसएस कार्यक्रम में शामिल होने के दो दिन बाद ऐसे वक्त पर की गई है जब बीजेपी और शिवसेना के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है।

    आरएसएस मुख्यालय पर जाने को लेकर मुखर्जी के दौरे की उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी समेत कई नेताओं ने आलोचना की और चौतरफा प्रतिक्रिया देखने को मिली। 

    मुखर्जी के दौरे का विरोध करने को लेकर कांग्रेस की आलोचना करते हुए शिवसेना ने उसे 'बिना आवाज वाले पटाखे' करार दिया। जबकि, आरएसएस पर इस बात को लेकर निशाना साधा कि आखिर क्यों उन्होंने वरिष्ठ नेता को चुना जो नेहरू के दिल के करीब हैं। 

    संपादकीय में आगे यह कहा गया है कि आरएसएस के थिंक टैंक भविष्य की राजनीति में ऐसे दौरों (प्रणब मुखर्जी उनमें से एक) का इस्तेमाल करेगी। उनके दिमाग में इस खास कार्यक्रम को लेकर क्या है वह सिर्फ 2019 के लोकसभा चुनाव के वक्त ही पता चला पाएगा।

    इसमें आगे कहा गया है कि दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा तेज़ हो गई है कि चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए प्रणब मुखर्जी सर्वमान्य उम्मीदवार हो सकते हैं। अगर बीजेपी चुनाव में लोकसभा के लिए जरूरी आंकड़े जुटाने में असफल रहती है तो मुखर्जी सर्वमान्य उम्मीदवार हो सकते हैं।

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  • सत्ता की चाभी पाकिट मे रखकर घूमने वाले अधिकारी

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    उत्तराखंड में कुछ अधिकारी ऐसे है जो सत्ता मे आसीन राजनेताओ की चाभी अपनी पाकिट में रखकर घूमते है। उन्हे किसी ट्रान्सफर पोस्टिंग की कोई चिंता नहीं होती क्योकि वो हर काम वो अपने तरीके से करना जानते है। सालो तक एक ही विभाग में काबिज, सालो तक अपनी मनमानी, ऐसा हुनर है उत्तराखंड के अधिकारियों में, इसी को तो दम कहते है।

    पत्रकारो को तो अधिकारी च्विगम की तरह समझते है कि बस चबाया और थूक दिया। उन अधिकारियों को ये नहीं पता कि कुछ पत्रकार ऐसे भी होते है जो होते तो चवन्नी के च्विंगम है और अगर बालो में चिपक जाये तो मुंडन करा के ही मानते है।

    खोजी नारद द्वारा जब भी कोई स्टोरी लिखी जाती है तो कई दलाल सक्रिय हो जाते अपना मतलब साधने के लिए और एक नेपाली गटुए दलाल को आगे कर दिया जाता है। खोजी नारद के शब्दो को भी कॉपी किया जाता है। अब ऐसे लोगो का असल चेहरा दिखाने का वक़्त करीब है और उनको खोजी नारद की हिदायत भी है और चंद पंक्तियाँ भी :-

                       " मेरा ख्याल तेरी चुप्पियों को आता है"

                        "तेरा ख्याल मेरी हिचकियों को आता है"

    अब जीरो टोलरेंस की सरकार मे ऐसे दलालो और ऐसे अधिकारियों से मेरी बेपनाह मुहब्बत का वक़्त करीब आ गया है और जब खोजी नारद ऐसी मुहब्बत करता है तो अंजाम और परिणाम सरकार के पक्ष मे जरूर आते है।

    कुछ भ्रस्ट अधिकारियों ने अपने चरम को पार कर दिया है, अपने बैंक खातो को भी और अपने रिश्तेदारों के खातो को भी, जिनको बेनकाब करना जरूरी है।

    ये अधिकारी ऐसे है कि सरकार कोA से Z तक का पूरा ज्ञान करवाते है, appele से शुरू होकर zebra पर आ जाते है। सही मायने मे तो फल से शुरू होते है और जानवर पर खत्म होते है।

    उन अधिकारियों से मेरा कहना है कि कुछ पत्रकार उत्तराखंड के ऐसे भी है जिन्होने आ से लेकर ज्ञा तक पढ़ा है। अ का मतलब अनपढ़ और ज्ञा का मतलब ज्ञानी पर खत्म होते है।

    ज्ञानी लोगो से जरा बच कर रहिए कही ऐसा ना हो कि सत्ता की चाभी पाकिट मे रखकर घूमने वालों तुम्हारी बारात में तुम भी पिटो और बाराती भी।

    कुछ ऐसे नेपाली भी है जो नाटी गुल्ली बने हुये है अपने आपको ऐसा पत्रकार बताते है जैसे जीबी रोड का चर्चित कोठा नंबर 64 हो। फुददु बनाने की दुकान सिर्फ सचिवालय मे घुसकर ऐसे चलाते है जैसे इनका बाप औरंगजेब हो।

    खबरों के नाम पर सिर्फ कानाफूसी और चुगली है जिसको दोहरी नागरिकता वाले पैतरेकार ही कर सकते है। अब खोजी नारद पर ऐसे नट्टों का पर्दाफाश होगा जिन्होने देवभूमि को सिर्फ अपने मंसूबो की गेमभूमि बना दिया है।

    उत्तराखंड अब परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है यहाँ के मुख्यमंत्री “मै” से नहीं हम से शुरू करते है और इसी हम में वो ताकत है जो ऐसे अधिकारियों की उनकी सही जगह कहाँ है, पहुंचाना जानते है।

    ऐसे अधिकारियों और पैतरेकारो जो उतराखंड के मुख्यमंत्री के खिलाफ धुआँ धार प्रचार करते है उनको ये नहीं पता कि उनकी अंदर धार तो बची नहीं है सिर्फ धुआँ-धुआँ बचा है।

    अभी उत्तराखंड में देखा है टेलर मुख्यमंत्री जी का 23 सूरमा जेल पहुँच गए है, उनका भूत तो उतर गया है अब तुम्हारे जैसे लोगो का भी भूत जल्द उतरेगा। अभी तुम्हारा टिकट वेटिंग में है जो जल्द ही क्न्फर्म होने की उम्मीद है।

     

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  • समाचार पत्र के कार्यालय में लगी आग, कोई अपशगुन तो नहीं

     

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    देहारादून।कल शाम एक दैनिक समाचार पत्र के कार्यालय मे सर्वर रूम में शॉट सर्किट हो जाने से आग लग गयी, कोई जनहानि नहीं हुई सभी पत्रकार बंधु और कर्मचारी सुरक्षित है।

    चूंकि मै खुद पत्रकारिता के क्षेत्र से हूँ इसलिए बारीकी से खबर पर नजर रखता हूँ। कल उसी दैनिक समाचार पत्र में एक विज्ञापन छपा था फ्रंट पेज पर, एक बिल्डर द्वारा अपने फ्लैट बेचने हेतु विज्ञापन दिया गया था। ये वही बिल्डर है जिनको 13 अप्रैल 2018 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता आज़ाद अली की याचिका के बाद नोटिस जारी हुआ है। कुछ माह पूर्व जब हाईकोर्ट उत्तराखंड मे याचिकाकर्ता द्वारा याचिका कोर्ट में दायर की गयी थी, तब भी कई दैनिक समाचार पत्रो में विज्ञापनो की भरमार थी।

    सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में नदी की भूमि पर पट्टे आवंटित करना और फिर उसको भूमिधर करने के साथ-साथ उत्तराखंड सरकार के ज़ी.ओ. का हवाला भी है।

    जो हाई कोर्ट उत्तराखंड के आदेश पर 04-07-2013 जनहित रिट संख्या-233/2008 में उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी किया गया था, जिसमे 2 आदेश साफ साफ किये गए थे:-

    1   1- किसी भी निर्माण कार्यो के लिए नदी श्रेणी में दर्ज भूमि पर अग्रिम आदेशो तक प्रस्तावित ना किया जाये।

          2-अग्रिम आदेशो तक नदी श्रेणी में दर्ज किसी भी भूमि पर निर्माण किए जाने की अनुमति ना दी जाये।

    अब जब सरकार द्वारा जी.ओ. जारी हो गया था तब बिल्डर द्वारा मानचित्र कैसे स्वीकृत कैसे करवा लिया गया और प्राधिकरण ने कैसे मानचित्र स्वीकृत कर दिया।

    खैर अब मुद्दे की बात तो ये है कि नदी के नाम पर राजनीति करने वाले सत्ता के शीर्ष पर तो जरूर पहुंचे पर अर्श से फर्श पर कब आए पता न चला। हमारे राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत जी भी गंगा से जुड़े हुये है, नमामि गंगे के राष्ट्रीय संयोजक भी रहे है।

    नदियो का दोहन उनके राज्य में ज्यादा हो रहा है और नदियां जो सभी मनुष्य एवं जानवरो के जीवन का अति महत्वपूर्ण हिस्सा है वो त्रिवेन्द्र रावत जी को अगाह कर रही है कि अभी भी वक़्त है हमे बचा लो। त्रिवेन्द्र जी संवेदनशील व्यक्तिव के धनी भी है और नदियो के महत्व को बखूबी समझते भी है। अब नदियो को कैसे भूमाफियाओ द्वारा बचाना है उनके रुख को सभी आने वाले समय में देखेंगे।

    मीडिया का आम आदमी के जीवन में भी महत्वपूर्ण योगदान है, लोग आज भी मीडिया को अपने जीवन का महत्वपूर्ण अंग मानते है। हम अगर सच से परे हो जाएँगे तो फिर प्रकृति हमे अगाह करती ह। विज्ञापन लेना और देना दोनों गुनाह नहीं है पर अपनी किसी गलती और गुनाह पर पर्दा डालने के लिए विज्ञापन का सहारा देना और लेना दोनों ही गुनाह है और प्रकृति हमे कुछ ना कुछ अंदेशा जरूर देती है जिसे हम अपशगुन का नाम देते है।

    अगर नदियां ही ना बची तो व्यक्ति अपनी जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता है, किसी का जीवन बचाना बहुत बड़ा उपकार होता है और सभी के जीवन से जुड़ी हुई नदियो को बचाना बहुत बड़ा परोपकार है साथ में हमारा ही कर्तव्य भी है। कोई भी अगर सभी के जीवन से खिलवाड़ करेगा तो प्रकृति भी हमसे खिलवाड़ करेगी। तब हम चाह कर भी खुद को बचा नहीं पाएंगे।

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