• "डाबर" का तेल और MDDA का मेल, गज़ब हो रहा खेल!

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    देहारादून। जब बच्चे छोटे होते है तो माँ बच्चे की हड्डियों को मजबूत करने के लिए डाबर का तेल लगाती है । उत्तराखंड की राजधानी देहारादून में भी मसूरी देहारादून विकास प्राधिकारण मे डाबर का तेल खूब चर्चा का केंद्र बन रहा है । एमडीडीए के आला अधिकारियो पर डाबर के तेल की ऐसी मालिश हुई कि उन्होने अपनी हड्डियों को बचाने के लिए एक बिल्डिंग का मानचित्र स्वीक्रत कर दिया। मुख्यमंत्री कार्यालय से महज 500 मीटर पर एक बिल्डिंग के कम्पौंडिंग मानचित्र को मंजूरी दे दी गयी जो नियमो को ताक पर रखकर बना है। पूरे उत्तराखंड में माननीय हाईकोर्ट के निर्देश पर अवैध अतिक्रमण पर प्रशासन और एमडीडीए ने अभियान छेड़ रखा है, और अगर कोई महज एक शपथ पत्र के आधार पर अपना अवैध मानचित्र शमन करवा ले और प्राधिकारण के आला अधिकारी उसके बाद डाबर के तेल से मालिश करवा अपनी आंखे मूद कर सो जाए तो उसे क्या कहा जाएगा।

    ये तो शोले की बसंती वाली बात हो गयी कि हमे बकबक करने की आदत भी नहीं है और नियम के अनुसार शपथ पत्र ले लिया है अगर उक्त प्रकरण से संबन्धित प्राधिकारण को कोई शिकायती पत्र मिलेगा तो कार्यवाही जरूर होगी। इस टाइप के बयान आपको समाचार पत्रो में और न्यूज़ चैनल में प्राधिकरण के आला अधिकारियों के सुनने को मिलते रहते होगे। केष्टो मुखर्जी का नाम तो आप जानते होंगे? प्राधिकरण के एक आला अधिकारी भी केष्टो मुखर्जी के अवतार मे है चंपी तेल और मालिश? सर तो तेरा चकराय या दिल डूबा जाए, आजा प्यारे पास हमारे, काहे घबराए?

    अबकी बार कुछ अलग होगा क्यूकि इस आला अधिकारी पर ऐसा शोध हुआ है जिससे आप सभी अवगत होना चाहेंगे। एक कंपनी जिसकी फ़ाइल गुम होने की रिपोर्ट भी दर्ज कारवाई जाती है और उसके बाद जांच को प्रभावित भी किया जाता है, क्या है पूरा मामला जल्द आपको खोजी नारद अवगत करवाएगा?

    फिलहाल दीगर बात ये है कि डाबर का ऐसा कौन सा तेल है जिससे प्राधिकरण के अधिकारियों की जमकर मालिश हुई है? यह मालिश किस सफेदपोश ने की और उत्तराखंड के ईमानदार हाकिम किसकिआँख कि किरकिरी बने हुये है? पूरी खबर जल्द आपके समक्ष।

    सूत्रो की माने तो प्राधिकरण के दो आला अधिकारी उत्तराखंड के हाकिम के रडार पर है जिन पर कार्यवाही जल्द होनी है और अगर ऐसा होता है तो भ्रस्टाचार पर जरूर लगाम लगेगी ।

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  • अब साहब के "रडार" पर कल्लू, कहेगा “रब्बा इश्क ना होवे”

     

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    बात जब निकलती है तो दूर तलक जाती है अब साहब ने भी अपनी खुफिया टीम को कल्लू के पीछे

    लगा दिया है। कल्लू की बेनामी और नामी संपत्तियो के कागज देख साहब के होश भी फाख्ता है वो सोच

    रहे है कि इस कल्लू को गद्दे की रुई की तरह कैसे धुना जाए।

    देहरादून में घुसते ही बंद पड़े कारखानो वाला राज भी साहब तक पहुँच गया। नामी, बेनामी, नौकर-चाकर

    सब के नाम पर और नदी, खाले, सभी पतरी देख साहब दाँत पीस रहे है।

    सूत्र की माने तो साहब कर्री रिपोर्ट बना कर सरकारी जाल कल्लू पर डालने की कवायद कर रहे है।

    क्योकि साहब तीसरी आँख से हुये जख्म भूले नहीं है जिसको कल्लू द्वारा अंजाम दिया गया था। अब

    कल्लू को भी खबर लग चुकी है कि साहब की अरही घुसने वाली है तो कल्लू ने अपने जवां खून को

    दिमाग दिया कि कमल के फूल वाले भंवरों को जरा चारा डाल दो कम से कम हमारे प्रति चीनी कम ना हो।

    जंवा खून नेतुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-खमका पासा फेक दिया और जैसे साहब को घेरा था वैसे कमल वाले भँवरे भी जाल में फंस गए और अब नोट के साथ कल्लू अपनी मन मर्जी का सपोर्ट भी लेगा।

    अब जैसा सोचते है अधिकतर होता वैसा नहीं है भंवरो को वश में कर लिया कल्लू ने लेकिन भँवरो के सरदार के पास कल्लू और पूरे खानदान की जन्म कुंडली पहुँच गयी। अब साहब और कमल के भँवरो के सरदार दोनों कल्लू की कायनात ध्वस्त करने में साथ-साथ है।

    अब मसमसाया हुआ कल्लू भाई, साहब को ढेर-ढेर और अनाप-शनाप बकने में है पर कल्लू एक बात भूल गया कि बुड्ढे शेर के पंजे की खरोच भी खतरनाक होती है।

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  • ओवर रेटिंग के खेल में बड़के भैया बने सुपरमैन आबकारी मंत्री को क्यो बना दिया बैडमैन?

    wine.jpgआबकारी विभाग की टीआरपी इन दिनो टॉप पर है वजह है ओवर रेटिंग का खेल, राज्य के कई जिलो मे आबकारी विभाग ओवर रेटिंग का डमरू बजा रहा है। हर दिन लाखो की शराब की बिक्री पर जनता से ओवर रेटिंग का मोटा रुपया किसकी जेब में जा रहा है। देहारादून जिले का हाल तो और भी सुभान है, यहाँ जिले में तैनात बड़के भैया के पास तो किसी के सवाल का जबाब देने तक की फुर्सत नहीं है। वो तो सुपरमैन की भूमिका में आजकल दिख रहे है, जगह जगह छापेमारी हो रही है लाखो के माल पकड़े जा रहे है पर बड़के भैया सालभर तक आंख कान की मालिश मे व्यस्त थे। अब अचानक से मालिश के बाद सुपरमैन की भूमिका में है। आबकारी मंत्री के पास किसी भी बात का जबाब नहीं है, क्या उनकी शह पर बड़के भैया सुपरमैन की भूमिका मे है या फिर मंत्री जी को विभाग के कार्यो में दिलचस्पी नहीं है?

    इस समय आबकारी मंत्री क्यो मनमोहन सिंह बने हुये है? विभाग के 3 से 4 सुपरमैनो की हरकतों से मंत्री जी की बैडमैन छवि बनती दिख रही है?

    क्या उत्तराखंड की सरकार जीरो टोंलरेन्स की है या फिर सवालो के जबाबों के टोंलरेन्स की है?

    अगर इस विभाग के मंत्री जी ने जल्द ही अपनी चुप्पी ना तोड़ी तो उनपर प्रश्न चिन्ह लगना तय है।

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  • क्या देहारादून की कैंट विधानसभा सीट से तिलक करेंगे बेहड़ ?

    सूत्रो की माने तो “शेर ए तराई” की ख्याति प्राप्त और पूर्व स्वास्थ मंत्री तिलक राज बेहड़ देहारादून की कैंट विधानसभा सीट से अपनी ताल ठोक सकते है।

    हल्द्वानी और रुद्रपुर से विधायक रह चुके तिलक राज बेहड़, अब अपनी सीमा रेखा को बढ़ाकर देहारादून मे स्थापित करने के मंथनदौर मे है। अपनी काबलियत और स्वच्छ छवि के धनी बेहड़, देहारादून के लिए कोई नया नाम नहीं है। उन्हे बीजेपी और काँग्रेस दोनों के कार्यकर्ता बखूबी जानते और पहचानते है।

    देहारादून की कैंट सीट से आने वाले समय में कॉंग्रेस के कई दावेदार हो सकते है लेकिन कोई भी ऐसा स्थापित चेहरा ऐसा नहीं है, जो बीजेपी के वर्तमान विधायक को टक्कर दे सके। सात चुनाव लड़ चुके बेहड़ के पास अनुभव के साथ लोगो के बीच काफी लोकप्रिय भी है।

    अब बेहड़ के देहारादून स्थापित होने पर कॉंग्रेस और बीजेपी के नेताओ की “पेशानी” पर बल पड़ सकते है। ये तो आने वाला वक़्त बताएगा कि कितने अनाड़ी इस खिलाड़ी के सामने टिक पाएंगे।

    नूरा कुश्ती के माहिर खिलाड़ी बेहड़ क्या आने वाले वक़्त में कैंट विधान सीट से “तिलक” करेंगे या अभिषेक, इसका जबाब तो भविष्य की गर्द मे ही है।

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  • गच्च से बैठे और भच्च से गिर गये क्या?

    उत्तराखंड का दुर्भाग्य ये है की नेताओ और राजनीति हिलोरे भी मारती है और हिचकोले भी खाती है। सत्रह सालो में सिर्फ एक मुख्यमंत्री विकास और विश्वनीयता का प्रतीक रहा बाकी नेता अपने रिपोर्ट कार्ड मे फिस्सड्डी ही रहे, चाहे काँग्रेस हो या भाजपा दोनों ही प्रमुख दल के आलाकमान उत्तराखंड के मुख्यमंत्री चुनने मे फेल ही रहे।

    कोई भी टिकाऊ, भरोसेमंद, ईमानदार, और विश्वसनीय मुख्यमंत्री ना चुन पाया। इसे तो इस राज्य का दुर्भाग्य ही माना जाए।

    वर्तमान मुख्यमंत्री पर भी कुर्सी से रिहाई के लिए चीख पुकार करते विधायको का एक बड़ा समूह पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद रमेश पोखरियाल निशंक के दरबार जा पहुचा और खेवनहार निशंक से मदद की गुहार चाय पार्टी के दौरान लगा डाली।

    निशंक का मतलब होता है, “जिन्हे किसी बात की शंका और भय ना हो”! अब अगर इतने विधायको का समूह चीख चिल्ला रहा है, तो इसे वर्तमान मुख्यमंत्री का विधायको के प्रति नकारत्मक टोलरेंस ही माना जा रहा है।

    अब निशंक क्या इन लाचार विधायको के खेवनहार बन पाएंगे, ये तो आने वाला वक़्त तय करेगा।

    भाजपा के आलाकमान को अब तय करना चाहिए की मजबूत, सुशील, उपयुक्त एवं टिकाऊ भरोसेमंद कौन सा नेता है, जो आने वाले लोक सभा चुनाव और ये बार बार के विद्रोह से उनकी नैया पार लगा सके।

    फिर से पुनः ऐसा ना हो कि गच्च से बैठे और भच्च से भरभरा जाए।

    त्रिवेन्द्र रावत अगर राजनैतिक रूप से परिपक्व होते तो शायद ये स्थिती ना आती, उन्होने अपने इर्द गिर्द ऐसे लोग नियुक्त कर दिये जो सिर्फ बतोलों की घुट्टी बना कर पिलाने के महारथी है, चाहे उनके मीडिया सलाहकार हो उनके थिंक टैंक सिपेसलाहकारो की फौज, जो सिर्फ सत्ता की मौज ले रहे है उनका मुद्दो और उत्तराखंड जनता से कोई लेना देना नहीं है।

    उन जैसे सिपेसलाहकारो लिए तो कुछ शब्द है:-

    फूलो से जग आसान नहीं होता है..

    रुकने से पग गतिमान नहीं होता है..

    है नाश जहां निर्मम वही होता है..

    तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो...

    पग-पग में गति आती है,छाले छिलने से..

    तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो...

    मै ठुकरा सकू तुम्हें भी हँसकर..

    जिससे तुम मेरा मन मानस पाषाण करो॥

    जब संगत बुरी हो और मती भ्रस्ट हो जाए तो “डाकू रत्नाकर” बनते है और जब मार्गदर्शक और संगत अच्छी हो तो डाकू भी रत्नाकर से बाल्मीकी बनते है।

    उत्तराखंड को एक ऐसे ही बाल्मीकी की जरूरत है, जो इतिहास रचे अच्छाई, सच्चाई और कर्मठता से कार्य करने के लिए पंडित नारायण दत्त तिवारी जैसा उदाहरण हो।

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  • तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-खम, से हुआ गिल्ली डंडे का मैच

     

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    कभी कभी खोजी नारद के पाठक सोचते होंगे की ये कैसे-कैसे शब्द है जिनको समझने के लिए दिमागी कसरत करनी पड़ती है। खोजी नारद आप सभी की दिमागी इंद्रियो को कसरत कराता रहता है।

    तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-खम से एक गिल्ली डंडे का मैच हुआ, जिसमे करोड़ो रुपये अला..बला विभागो का खर्च हुआ जैसे खली के प्रोग्राम में करोड़ो की बलि ली गयी थी।

    अबकी बार कंपनी के मालिक का खून जंवा था तो तुर्रा ए पुर पेच ओ खम का सहारा लिया गया और प्रोग्राम का सफल आयोजन हुआ।

    विभागो के कई भाई लोगो ने तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-खम का काफी लुत्फ लिया और मौज बहार भी बटोर ली। इन विभागो के भाई लोगो के पास तो विभागीय भुगतान करने के लिए भी कौड़ी कौड़ी का टोटा है, अब गिल्ली डंडे के लिए कौन सा पेड़ हिलाकर निकाल दिये समझ मे नहीं आया पर ये जरूर पता लगा सबको तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-खम का कंधा दिया गया था, कुबेर की चाबी खोलने के लिए।

    अब सवाल ये है कि इतना सब किस लिए अरे भाई लोगो बे...काक का सहारा ले लेते। पूर्व वाले साहब ने भी सहयोग किया खूब पर उनको तो ना सिरा पता चला ना छोर, अब अंदर से आवाज आ रही है उनके,

                          खुदा के वास्ते पर्दा ना उठा काबे का जालिम

                       कही ऐसा न हो यंहा भी कि वही काफ़िर सनम निकले

    अब आप सभी अपने दिमाग को जोरदार कसरत करवाए और जब तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-खमका पता चले तो फ़ेस....पर जरूर बके। ताकि विभागो के भाई लोग सतर्क हो जाए।

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  • पीएनबी के मास्टर डेबिट कार्ड और आपके खाते से रकम गायब

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    पंजाब नेशनल बैंक भरोसे का प्रतीक अब नहीं रह गया है, नीरव मोदी का घोटाला सामने आनेके बाद लोगो का

    भरोसा टूटता जा रहा है। देहारादून में पंजाब नेशनल बैंक की अधोईवाला ब्रांच की खाता धारक अंजलि नयाल के

    साथ तो ऐसा ही हुआ। खोजी नारद को उन्होने अपने साथ हुई धोखाधड़ी की कहानी को खुद बयां किया। अंजलि द्वारा लाइफ स्टाइल के शोरूम से 9 जुलाई 2017 को लगभग 4564/- रुपएकी खरीददारी की गयी और पीएनबी का मास्टर डेबिट कार्ड से पेमेंट किया गया। पहली बार कार्ड स्वाइप करते समय कार्ड का ट्रांजकशनफेल हो गया,

    जब शो रूम द्वारा दोबारा कार्ड को स्वाइप किया तब ट्रांजकशन ओके हुआ । उसके बाद जब अंजलि द्वारा कुछ

    समय बाद अपनी पासबूक अपडेट कारवाई गयी तब उनको पता चला कि उनके खाते से दो बार 4564/- रुपए

    कट गए है।

    (विडियो देखे और इस लिंक पर क्लिक करे-:)

    https://youtu.be/RNmfrcy1Pnk


    जब अंजलि द्वारा बैंक से इस बाबत पूछा गया और ट्रांजकशन फेल और सक्सेस की स्लिप दिखाई गयी तब बैंक ने

    कहा की आपके खाते में रुपए वापस आ जाएंगे। इ स बात को एक वर्ष पूरा होने वाला है और अंजलि के रुपए आज

    तक वापस नहीं आए। बैंक पर चक्कर काट काट कर अंजलि ने रुपए वापस मिलने की उम्मीद छोड़ दी है।

    जब खोजी नारद की एक बैंक अधिकारी से बात हुई तो उन्होने नाम ना छापने की शर्त पर सही बात बताई और

    कहा कि पीएनबी के वेंडर ही बैंक को चूना लगा रहे है, उन्होने बताया की मास्टरकार्ड एक अमेरिकन कंपनी है, जब

    पीएनबी द्वारा ऐसी ट्रांजकशन के रिफ़ंड की मेल की जाती है तब मास्टरकार्ड कंपनी द्वारा कोई सपोर्ट नहीं मिलता

    है और थक हार कर बैंक ग्राहक को टहलाता रहता है। अब आप ही सोचिए ऐसे कितने हजारो और लाखो ग्राहक

    होंगे जो ऐसी ठगी का शिकार हुये होंगे और बैंक के चक्कर काट काट कर थक चुके होंगे और अपने रकम भूल

    चुके होंगे।

    लोगो की गाढ़ी कमाई का ये रुपया आखिर किसकी जेब मे गया होगा। आप अंजलि नयाल का विडियो देखिये कि

    एक साल बीत जाने के बावजूद भी उनको अपने रुपए वापस नहीं मिले। क्या पीएनबी का वेंडर मास्टर कार्ड लोगो

    कीजेब पर डाँका डालने का साधन तो नहीं।

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  • सत्ता की चाभी पाकिट मे रखकर घूमने वाले अधिकारी

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    उत्तराखंड में कुछ अधिकारी ऐसे है जो सत्ता मे आसीन राजनेताओ की चाभी अपनी पाकिट में रखकर घूमते है। उन्हे किसी ट्रान्सफर पोस्टिंग की कोई चिंता नहीं होती क्योकि वो हर काम वो अपने तरीके से करना जानते है। सालो तक एक ही विभाग में काबिज, सालो तक अपनी मनमानी, ऐसा हुनर है उत्तराखंड के अधिकारियों में, इसी को तो दम कहते है।

    पत्रकारो को तो अधिकारी च्विगम की तरह समझते है कि बस चबाया और थूक दिया। उन अधिकारियों को ये नहीं पता कि कुछ पत्रकार ऐसे भी होते है जो होते तो चवन्नी के च्विंगम है और अगर बालो में चिपक जाये तो मुंडन करा के ही मानते है।

    खोजी नारद द्वारा जब भी कोई स्टोरी लिखी जाती है तो कई दलाल सक्रिय हो जाते अपना मतलब साधने के लिए और एक नेपाली गटुए दलाल को आगे कर दिया जाता है। खोजी नारद के शब्दो को भी कॉपी किया जाता है। अब ऐसे लोगो का असल चेहरा दिखाने का वक़्त करीब है और उनको खोजी नारद की हिदायत भी है और चंद पंक्तियाँ भी :-

                       " मेरा ख्याल तेरी चुप्पियों को आता है"

                        "तेरा ख्याल मेरी हिचकियों को आता है"

    अब जीरो टोलरेंस की सरकार मे ऐसे दलालो और ऐसे अधिकारियों से मेरी बेपनाह मुहब्बत का वक़्त करीब आ गया है और जब खोजी नारद ऐसी मुहब्बत करता है तो अंजाम और परिणाम सरकार के पक्ष मे जरूर आते है।

    कुछ भ्रस्ट अधिकारियों ने अपने चरम को पार कर दिया है, अपने बैंक खातो को भी और अपने रिश्तेदारों के खातो को भी, जिनको बेनकाब करना जरूरी है।

    ये अधिकारी ऐसे है कि सरकार कोA से Z तक का पूरा ज्ञान करवाते है, appele से शुरू होकर zebra पर आ जाते है। सही मायने मे तो फल से शुरू होते है और जानवर पर खत्म होते है।

    उन अधिकारियों से मेरा कहना है कि कुछ पत्रकार उत्तराखंड के ऐसे भी है जिन्होने आ से लेकर ज्ञा तक पढ़ा है। अ का मतलब अनपढ़ और ज्ञा का मतलब ज्ञानी पर खत्म होते है।

    ज्ञानी लोगो से जरा बच कर रहिए कही ऐसा ना हो कि सत्ता की चाभी पाकिट मे रखकर घूमने वालों तुम्हारी बारात में तुम भी पिटो और बाराती भी।

    कुछ ऐसे नेपाली भी है जो नाटी गुल्ली बने हुये है अपने आपको ऐसा पत्रकार बताते है जैसे जीबी रोड का चर्चित कोठा नंबर 64 हो। फुददु बनाने की दुकान सिर्फ सचिवालय मे घुसकर ऐसे चलाते है जैसे इनका बाप औरंगजेब हो।

    खबरों के नाम पर सिर्फ कानाफूसी और चुगली है जिसको दोहरी नागरिकता वाले पैतरेकार ही कर सकते है। अब खोजी नारद पर ऐसे नट्टों का पर्दाफाश होगा जिन्होने देवभूमि को सिर्फ अपने मंसूबो की गेमभूमि बना दिया है।

    उत्तराखंड अब परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है यहाँ के मुख्यमंत्री “मै” से नहीं हम से शुरू करते है और इसी हम में वो ताकत है जो ऐसे अधिकारियों की उनकी सही जगह कहाँ है, पहुंचाना जानते है।

    ऐसे अधिकारियों और पैतरेकारो जो उतराखंड के मुख्यमंत्री के खिलाफ धुआँ धार प्रचार करते है उनको ये नहीं पता कि उनकी अंदर धार तो बची नहीं है सिर्फ धुआँ-धुआँ बचा है।

    अभी उत्तराखंड में देखा है टेलर मुख्यमंत्री जी का 23 सूरमा जेल पहुँच गए है, उनका भूत तो उतर गया है अब तुम्हारे जैसे लोगो का भी भूत जल्द उतरेगा। अभी तुम्हारा टिकट वेटिंग में है जो जल्द ही क्न्फर्म होने की उम्मीद है।

     

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  • समाचार पत्र के कार्यालय में लगी आग, कोई अपशगुन तो नहीं

     

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    देहारादून।कल शाम एक दैनिक समाचार पत्र के कार्यालय मे सर्वर रूम में शॉट सर्किट हो जाने से आग लग गयी, कोई जनहानि नहीं हुई सभी पत्रकार बंधु और कर्मचारी सुरक्षित है।

    चूंकि मै खुद पत्रकारिता के क्षेत्र से हूँ इसलिए बारीकी से खबर पर नजर रखता हूँ। कल उसी दैनिक समाचार पत्र में एक विज्ञापन छपा था फ्रंट पेज पर, एक बिल्डर द्वारा अपने फ्लैट बेचने हेतु विज्ञापन दिया गया था। ये वही बिल्डर है जिनको 13 अप्रैल 2018 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता आज़ाद अली की याचिका के बाद नोटिस जारी हुआ है। कुछ माह पूर्व जब हाईकोर्ट उत्तराखंड मे याचिकाकर्ता द्वारा याचिका कोर्ट में दायर की गयी थी, तब भी कई दैनिक समाचार पत्रो में विज्ञापनो की भरमार थी।

    सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में नदी की भूमि पर पट्टे आवंटित करना और फिर उसको भूमिधर करने के साथ-साथ उत्तराखंड सरकार के ज़ी.ओ. का हवाला भी है।

    जो हाई कोर्ट उत्तराखंड के आदेश पर 04-07-2013 जनहित रिट संख्या-233/2008 में उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी किया गया था, जिसमे 2 आदेश साफ साफ किये गए थे:-

    1   1- किसी भी निर्माण कार्यो के लिए नदी श्रेणी में दर्ज भूमि पर अग्रिम आदेशो तक प्रस्तावित ना किया जाये।

          2-अग्रिम आदेशो तक नदी श्रेणी में दर्ज किसी भी भूमि पर निर्माण किए जाने की अनुमति ना दी जाये।

    अब जब सरकार द्वारा जी.ओ. जारी हो गया था तब बिल्डर द्वारा मानचित्र कैसे स्वीकृत कैसे करवा लिया गया और प्राधिकरण ने कैसे मानचित्र स्वीकृत कर दिया।

    खैर अब मुद्दे की बात तो ये है कि नदी के नाम पर राजनीति करने वाले सत्ता के शीर्ष पर तो जरूर पहुंचे पर अर्श से फर्श पर कब आए पता न चला। हमारे राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत जी भी गंगा से जुड़े हुये है, नमामि गंगे के राष्ट्रीय संयोजक भी रहे है।

    नदियो का दोहन उनके राज्य में ज्यादा हो रहा है और नदियां जो सभी मनुष्य एवं जानवरो के जीवन का अति महत्वपूर्ण हिस्सा है वो त्रिवेन्द्र रावत जी को अगाह कर रही है कि अभी भी वक़्त है हमे बचा लो। त्रिवेन्द्र जी संवेदनशील व्यक्तिव के धनी भी है और नदियो के महत्व को बखूबी समझते भी है। अब नदियो को कैसे भूमाफियाओ द्वारा बचाना है उनके रुख को सभी आने वाले समय में देखेंगे।

    मीडिया का आम आदमी के जीवन में भी महत्वपूर्ण योगदान है, लोग आज भी मीडिया को अपने जीवन का महत्वपूर्ण अंग मानते है। हम अगर सच से परे हो जाएँगे तो फिर प्रकृति हमे अगाह करती ह। विज्ञापन लेना और देना दोनों गुनाह नहीं है पर अपनी किसी गलती और गुनाह पर पर्दा डालने के लिए विज्ञापन का सहारा देना और लेना दोनों ही गुनाह है और प्रकृति हमे कुछ ना कुछ अंदेशा जरूर देती है जिसे हम अपशगुन का नाम देते है।

    अगर नदियां ही ना बची तो व्यक्ति अपनी जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता है, किसी का जीवन बचाना बहुत बड़ा उपकार होता है और सभी के जीवन से जुड़ी हुई नदियो को बचाना बहुत बड़ा परोपकार है साथ में हमारा ही कर्तव्य भी है। कोई भी अगर सभी के जीवन से खिलवाड़ करेगा तो प्रकृति भी हमसे खिलवाड़ करेगी। तब हम चाह कर भी खुद को बचा नहीं पाएंगे।

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  • सड़क सुरक्षा जागरूकता रैली का सफल आयोजन

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    भारत सरकार के निर्देश पर29 वें राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह के अंतर्गत आज दिनांक27 अप्रैल 2018 को देहरादून में परिवहन विभाग द्वारा सड़क सुरक्षा रैली का आयोजन किया गया

    इस अवसर पर सचिव एवं आयुक्त परिवहनडी. सेंथिल पंडियनद्वारा रैली को हरी झंडी दिखाकर रवानाकिया गयाउनके द्वारा स्कूली बच्चों विभिन्न परिवहन व्यवसाइयों का आह्वानकिया गया कि सड़क सुरक्षा नियम अपनाएं और अपने जीवन को सुरक्षित बनाएं

    रैली के अवसर पर जिलाधिकारी देहरादून वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकनिवेदिता कुकरेती कुमार,देहरादून अपर परिवहन आयुक्त संभागीय परिवहन अधिकारी देहरादून एवंपरिवहन विभाग के अधिकारी कर्मचारी उपस्थित हुए,इस रैली में 500 छात्र छात्राओ एवं 250 नागरिकों ने हिस्सा लिया।

    इसके अतिरिक्त आज प्रदेश भर में सभी स्कूलों में अध्यापको एवं स्कूली छात्र छात्राओं द्वारा सड़क सुरक्षा की शपथ ग्रहण की गईइस जागरूकता रैली के सफल आयोजन में अपर परिवहन आयुक्त सुनीता सिंह, आरटीओ सुधांशु गर्ग, एआरटीओ अरविंद पांडे, सभी ने अपना सहयोग किया।

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  • “चच्चा का बच्चा” भीषण सलाहकार बना ज्ञानी पंडित

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    आज कल का जमाना बड़ा खराब है अपने ही चिराग अपना घर फूँक तमाशा देखकर मज़े ले रहे है। अब “चच्चा के बच्चे” को ही ले लो, पाल पोस बड़ा किया, अब चच्चा के आगे पीछे बच्चा कलम को तलवार बना घुसा घुसा कर घायल कर रहा है।

    एक समय मे “चच्चा का बच्चा” “भीषण सलाहकार” बन बैठा और ज्ञानी होने का अहम पाल बैठा, एक दिन इस विभीषण ने साहब का सपना ही

    चूर-चूर नान कर दिया। इतना मक्खन लगा दिया साहब के, और फिर चूर-चूर कर दिया उनको, बस साहब देर से समझे।

    अब चच्चा के बच्चे के पीछे एक खबरनवीज पड़ गया, बच्चे ने अपने ज्ञानी पंडित वाला दिमाग लगा कर उसको अपने साथ मिला लिया।

    अब उस खबरनवीज़ को बच्चा बोला की मेरे पास तो कुछ नहीं सब साहब के गुर्गे ले गए, तुम को चच्चा ज्ञान देता हूँ।

    बस फिर क्या था एक टाइपिंग मिस्टेक को हथियार बना खरनवीज को बोला मेरा नाम छाप दो, फिर देखो सभी

    “आ-लाये सरकार” चच्चा के पीछे होंगे। हुआ भी यही “आ-लाये सरकार” ने तुरंत अपने हाकिमों को वस्तुस्थिति से

    अवगत कराने को बोला।

    अब परेशान चच्चा तुरंत अपने बच्चे के पास जाएगा या नहीं?

    बच्चा अंदर ही अंदर खुश है की खबरनवीज़ पहले उसके पीछे था उसका दिमाग घुमा चच्चा के पीछे लगा दिया।

    खबरनवीज़ भी खुश हो भागा-भागा घूम रहा है बच्चे ने काम पर जो लगा दिया।

    अधूरा ज्ञान शेर को बिल्ली तो बना गया लेकिन एक दिन तो साहेबे शेर का रुक्का परचम पर आएगा जरूर।

    "बच्चा" अब खाली भी था क्योकि भीषण सलाहकार “विभीषण” बनकर साहब की नैया डुबो आया था, अब ज्ञानी

    पंडित किसको अपने ज्ञान का प्रसाद बांटे। तो अपने दुश्मनों की लिस्ट बना साफ करने मे लगा है। ना इस बच्चे के

    गेम को चच्चा समझ पाये और ना ही खबरनवीज़। अब आ-लाहे सरकार को भी खबरनवीज़ द्वारा घेरे मे ले लिया।

    अब बारी किसकी ये अगली किस्त में क्यूकि परकाश कम हो गया है अब परकाश गद्दे में सोएगा।

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