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संचार माध्यम के लिए बनाया गया भारत का उपग्रह जीसैट-15 आज तड़के सुबह सफलता पूर्वक यूरोपीय एरियान-5

दिवाली मिलन समारोह के मौके पे मीडिया से मुख़ातिब होते हुए गृहमंत्री राजनाथ सिंह नें स्पष्ट किया है कि सरकार

जेटएयरवेज के बोइंग 777 विमान के यात्रियों के लिए मुंबई से ब्रूसेल्स तक की यह लंबी यात्रा बिलकुल भी आरामदायक नहीं रही। दरअसल पिछले शुक्रवार इस यात्रा के दौरान नियमों के मुताबिक एक पायलट कंट्रोल्ड रेस्ट यानी कि नींद की एक झपकी ले रहा था, जबकि दूसरी महिला पायलट टैब पर व्यस्त हो गई, जिससे विमान अचानक ही

जेटएयरवेज के बोइंग 777 विमान के यात्रियों के लिए मुंबई से ब्रूसेल्स तक की यह लंबी यात्रा बिलकुल भी आरामदायक नहीं रही। दरअसल पिछले शुक्रवार इस यात्रा के दौरान नियमों के मुताबिक एक पायलट कंट्रोल्ड रेस्ट यानी कि नींद की एक झपकी ले रहा था, जबकि दूसरी महिला पायलट टैब पर व्यस्त हो गई, जिससे विमान अचानक ही

जेटएयरवेज के बोइंग 777 विमान के यात्रियों के लिए मुंबई से ब्रूसेल्स तक की यह लंबी यात्रा बिलकुल भी आरामदायक नहीं रही। दरअसल पिछले शुक्रवार इस यात्रा के दौरान नियमों के मुताबिक एक पायलट कंट्रोल्ड रेस्ट यानी कि नींद की एक झपकी ले रहा था, जबकि दूसरी महिला पायलट टैब पर व्यस्त हो गई, जिससे विमान अचानक ही

एचपीयू ने यूजी ईयर सिस्टम के प्रथम वर्ष की अनुपूरक परीक्षा देने के लिए छात्रों को सुपर गोल्डन चांस दे दिया है। एचपीयू के इस फैसले से प्रदेश के हजारों छात्रों को राहत मिली है। 7000 की फीस के साथ परीक्षा फार्म जमा करवाकर छात्र सितंबर माह में होने वाली ईयर सिस्टम की अनुपूरक परीक्षाओं में बैठ सकेंगे। इसके लिए छात्रों को पांच अगस्त तक परीक्षा फार्म भरने होंगे। यह मौका सिर्फ उन छात्रों के लिए है, जिन्होंने मार्च 2013 में हुई यूजी ईयर सिस्टम की बीए/बीएससी/बीकॉम पास और आनर्स विषयों की सभी परीक्षाएं दी हैं। इन्होंने कॉलेज में बतौर नियमित छात्र पढ़ाई की हो और मार्च 2015 में अंतिम वर्ष की परीक्षा दी है। छात्रों के लिए विश्वविद्यालय की वेबसाइट www.hpuniv.in,www.hpuniv.nic.in पर परीक्षा फार्म उपलब्ध करवा दिए गए हैं। विवि के परीक्षा नियंत्रक प्रो. श्याम लाल कौशल ने कहा कि छात्र परीक्षा फार्म पांच अगस्त तक भर दें। इसके बाद जमा होने वाले फार्म पर विवि के नियमों के मुताबिक विलंब शुल्क भी लगेगा।

कॉल ड्रॉप के मामले में निशाने पर आईं टेलिकॉम कंपनियों को ट्राई (TRAI) से राहत मिलती दिख रही है। टेलिकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने कहा है कि बेहतर सर्विस के लिए पर्याप्त संख्या में सेल साइट्स का होना जरूरी है, लेकिन रेडिएशन को लेकर लोगों में भय और स्थानीय कानूनों से जुड़ी दिक्कतों से कंपनियां ये साइट्स यानी टॉवर नहीं लगा पा रही हैं। रैंडम चेकिंग में ट्राई ने जो डेटा जुटाए हैं, उनमें पाया गया कि दिल्ली में 523 साइट्स और मुंबई में 801 साइट्स पिछले छह महीनों में 'रेडिएशन से जुड़े भय' या नगर निकायों के साथ विभिन्न मुद्दों के कारण बंद हो गईं। ट्राई के पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रेडिएशन से जुड़े डर के कारण मुंबई में हर सप्ताह कम से कम 25 टॉवर बंद हो रहे हैं। ट्राई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ईटी से कहा, 'हम इसके लिए टेलिकॉम ऑपरेटर्स को कैसे दोष दे सकते हैं।' उन्होंने कहा, 'एक साइट बंद होने से आस-पास की चार साइट्स पर असर पड़ सकता है। इससे कॉल ड्रॉप के मामले बढ़ते हैं।' टेलिकम्यूनिकेशंस डिपार्टमेंट ने कॉल ड्रॉप के लिए टेलिकॉम कंपनियों पर जुर्माना लगाने की वकालत की थी, लेकिन अधिकारी ने बताया कि ट्राई ऐसा करने की बजाय इस मामले पर जल्दी ही एक कंसल्टेशन पेपर जारी कर सकता है ताकि देश में मोबाइल सर्विस की क्वॉलिटी बेहतर करने का रास्ता निकाला जा सके। टेलिकॉम डिपार्टमेंट ने खराब होती सर्विस के लिए दोषी टेलिकॉम कंपनियों पर जुर्माना लगाने के बारे में ट्राई से सलाह मांगी थी। टेलिकॉम डिपार्टमेंट ने सभी टेलिकॉम ऑपरेटरों से कहा है कि मोबाइल नेटवर्क्स में सुधार करने के लिए उन्होंने जो कदम उठाए हों, उनकी जानकारी 31 जुलाई तक दें। ट्राई ने दिल्ली और मुंबई में मोबाइल फोन नेटवर्क्स की सर्विस क्वॉलिटी की जांच जून और जुलाई में एक स्वतंत्र एजेंसी से कराई थी। इसमें सभी मोबाइल फोन ऑपरेटरों के नेटवर्क्स में कवरेज संबंधी बड़ी खामियां सामने पाई गईं। एयरटेल, आइडिया सेल्युलर, वोडाफोन, रिलायंस कम्युनिकेशंस, एयरसेल और टाटा टेलिसर्विसेज की सेवाओं की जांच की गई थी। जांच करने पर ट्राई ने पाया कि बिगड़ती सर्विस क्वॉलिटी की बड़ी वजह यह है कि कंपनियां टेलिकॉम टॉवरों की संख्या उचित मात्रा में नहीं बढ़ा पा रही हैं। भारती एयरटेल की टॉवर यूनिट भारती इंफ्राटेल के एमडी और सीईओ डी एस रावत ने कहा, 'नए टावर लगाना बहुत मुश्किल है। रेडिएशन से जुड़े डर के कारण लोग टॉवरों की लीज रिन्यू नहीं करा रहे हैं।'
मैगी नूडल्स के बाद अब देश भर के स्टोर्स पर नेस्ले का मैगी पास्ता भी नहीं मिल पाएगा। हालांकि ऐसा कुछ दिनों के लिए ही होगा। दरअसल, स्विस कंपनी की भारतीय इकाई नेस्ले इंडिया ने पास्ता की डिलिवरी कुछ दिनों के लिए बंद कर दी है। कंपनी पास्ता का पैक लेबल बदलेगी और 'नो ऐडेड MSG' डेक्लरैशन हटाएगी। नेस्ले इंडिया के प्रवक्ता ने ईटी के सवालों के जवाब में कहा, 'हम पैकेजिंग में बदलाव कर रहे हैं, जिससे सप्लाई में थोड़ी अड़चन आएगी।' उन्होंने कहा, 'हम मैगी पास्ता में मोनोसोडियम ग्लूटामेट (MSG) नहीं मिलाते हैं जैसा कि इसके पैकेट पर लिखा है। कुछ सामग्री में नैचुरल ग्लूटामेट होता है और ग्राहकों को उलझन न हो इसलिए हम अपना नो ऐडेड MSG का डेक्लरैशन हटा रहे हैं।' देश के फूड रेग्युलेटर 'फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया' (FSSAI) ने कहा है कि पैकेज्ड फूड में इस्तेमाल की गई सामग्रियों में अगर नैचुरल MSG है तो उसके लिए अलग से 'नो ऐडेड MSG' डेक्लरेशन देने की जरूरत नहीं है क्योंकि इससे ग्राहक के गुमराह होने का खतरा रहता है। MSG किसी प्रॉडक्ट का स्वाद बढ़ाता है, लेकिन यह वैज्ञानिक तरीकों से साबित हो चुका है यह सेहत के लिए नुकसानदेह है। मैगी पास्ता 80 फीसदी हिस्सेदारी के साथ रेडी-टु-कुक पास्ता वर्ग में नंबर वन है। इसकी कुल बिक्री 250 करोड़ रुपये की है। नेस्ले के प्रवक्ता ने साफ कर दिया कि प्रॉडक्ट में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा और न ही इसे बाजार से वापस लिया गया है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले फूड रेग्युलेटर की पाबंदी के बाद जून की शुरुआत में नेस्ले इंडिया को अपना पॉपुलर मैगी नूडल्स बाजार से वापस लेना पड़ा था। दरअसल, कुछ लैब टेस्ट में मैगी में तय सीमा से ज्यादा MSG पाया गया था। साथ ही 'नो ऐडेड डेक्लरेशन' पर भी रेग्युलेटर को ऐतराज था। इसके अलावा कंपनी बगैर प्रॉडक्ट अप्रूवल लिए मैगी ओट्स मसाला नूडल्स बेच रही थी। मैगी नूडल्स, नेस्ले का फ्लैगशिप ब्रैंड है। पाबंदी से पहले इसकी सेल्स 2,000 करोड़ से ज्यादा थी।

करीब 75 फीसदी भारतीयों का मानना है कि देश की मौजूदा आर्थिकि स्थिति बेहतर अवस्था में है। एक अमेरिकी शोध संस्था के अध्ययन के मुताबिक इन भारतीयों का मानना है कि भले ही ग्लोबल लेवल पर रिकवरी का दौर जारी हो लेकिन एक साल पहले की तुलना में देश की आज की आर्थिक स्थिति बेहतर है।

लोगों से बातचीत के आधार पर हाल ही में जारी अमेरिकी शोध संस्था पीईडब्ल्यू रिसर्च की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के आधे से ज्यादा उभरते हुए बाजारों यानी 21 में से 14 देशों के नागरिकों का रवैया देश की आर्थिक स्थिति को लेकर निराशाजनक है। इनमें यूक्रेन के 94 फीसदी, लेबनान के 89 फीसदी जबकि ब्राजील के 87 फीसदी लोग शामिल हैं जो अपने देश की आर्थिक स्थिति को निराशाजनक मानते हैं। जबकि ठीक उसी दौरान नब्बे फीसदी चीनी, 86 फीसदी वियतनाम के नागरिक और 74 फीसदी भारतीयों का यह मानना है कि साल 2015 में उनकी अर्थव्यवस्था बेहतर है।

हालांकि एक साल पहले आई ऐसी ही एक रिपोर्ट में भारत के 64 फीसदी लोगों ने देश कि अर्थव्यवस्था को बेहतर माना था।

सर्वे के मुताबिक विकसित अर्थव्यवस्था वाले देशों में औसतन 40 फीसदी का ही मानना है कि उनके देश की इकॉनमी अच्छी हालत में है। वहीं, उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में यह आंकड़ा 45 फीसदी जबकि विकासशील देशों में 46 फीसदी है।

रिसर्च स्पष्ट करती है कि दुनिया की लगभग सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में इकनॉमिक रिकवरी में जनता के भरोसे को यह आंकड़ा प्रदर्शित करता है। रिपोर्ट के मुताबिक जापान में साल 2012 की तुलना में 30 फीसदी, जबकि अमेरिका में साल 2009 की तुलना में 23 अंकों का उछाल आया है।

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