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सोनिया गांधी की बीमारी आधुनिक भारत का इतना बड़ा रहस्य क्यों है?

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एक बार फिर अस्वस्थ हैं. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए पहले नए लड़ाकों को मैदान में उतारकर (अगर शीला दीक्षित को नया कह सकते हैं तो) और फिर एक के बाद एक आक्रामक रणनीतियां बनाकर कांग्रेस यह जता चुकी है कि अगले बरस आने वाले यूपी के

चुनाव उसके लिए बेहद अहम हैं. लेकिन यूपी में कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा अहम प्रियंका और सोनिया गांधी होते हैं, और भले ही जमीनी स्तर पर राहुल गांधी कितनी ही तंग गलियों में जाकर वोट तलाशते नजर आते हों, लेकिन हमेशा से ही वहां पहले सोनिया अपनी रैलियों से चुनाव का बिगुल फूंकती हैं. उसके बाद पीछे-पीछे प्रियंका गांधी आकर खाली मैदानों को लाखों के हुजूम से भर देती हैं.

सन् 1999 की बात है. सोनिया गांधी रायबरेली और बेल्लारी से एक साथ चुनाव लड़ रही थीं. बेल्लारी में उनके खिलाफ बीजेपी की सुषमा स्वराज खड़ी थीं और वे तब तक अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थीं जबतक प्रियंका गांधी मैदान में नहीं उतरी थीं. आखिरी दिन के चुनाव प्रचार में कांग्रेस ने एक मार्च निकाला और उसमें आश्चर्यजनक रूप से पूरा बेल्लारी शहर सड़कों पर उतर आया. वजह रही सोनिया और प्रियंका की जुड़वां मौजूदगी. उस दिन प्रियंका गांधी ने उस चुनाव को पूरी तरह अपनी मां के पक्ष में कर दिया और यह उसी दिन पता लग गया कि सुषमा स्वराज यहां से नहीं जीतने वालीं.

    सोनिया गांधी फिलहाल गंगा राम अस्पताल में भर्ती हैं. वरिष्ठ कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद से लेकर कांग्रेस के हर छोटे-मोटे नेता तक एक पूर्वलिखित पटकथा से ही पढ़कर बयान दे रहे हैं और साफतौर पर नजर आ रहा है कि कुछ बड़ा छिपाया जा रहा है

आज भी बीजेपी और सपा-बसपा के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए कांग्रेस को इन्हीं मां-बेटी की जोड़ी की जरूरत उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा है. लेकिन एक रहस्यमय बीमारी से सोनिया गांधी का लगातार बीमार रहना न सिर्फ राजनीतिक रूप से कारगर इस जोड़ी के एक जोड़ीदार को यूपी चुनावों से दूर कर सकता है बल्कि इस सवाल को भी बार-बार जिंदा कर रहा है कि आखिर सोनिया गांधी की यह रहस्यमय बीमारी दुनिया से छिपाई क्यों जा रही है?

मोदी जी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 50 कारों के काफिले के साथ आठ किलोमीटर लंबा रोड शो करने पहुंचीं सोनिया गांधी को मंगलवार के दिन बीच में ही अपना शक्ति-प्रदर्शन रोकना पड़ा और चार्टर्ड प्लेन से वापस दिल्ली कूच करना पड़ा. खबर लिखे जाने तक उन्हें सेना के आर एंड आर अस्पताल से गंगा राम में शिफ्ट किया गया है और सभी कह रहे हैं कि उन्हें सिर्फ तेज बुखार है. वरिष्ठ कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद से लेकर कांग्रेस के हर छोटे-मोटे नेता तक एक पूर्वलिखित पटकथा से ही पढ़कर बयान दे रहे हैं और साफतौर पर नजर आ रहा है कि कुछ बड़ा छिपाया जा रहा है. कानाफूसी की आवाजों के बीच सोनिया गांधी की असल बीमारी के बारे में कोई बड़ा-छोटा नेता जानकारी नहीं देना चाहता और कांग्रेस की तरह ही सत्ताधारी बीजेपी भी सोनिया गांधी की इस बीमारी की ससम्मान हिफाजत कर उसे हमारे समय का एक अभेद्य राजनीतिक रहस्य बनाए रखने में मदद कर रही है.

गांधी ‘राज’ परिवार में ऐसे कई रहस्य ताला-जड़े संदूकों में बंद हैं जिनपर पब्लिक स्पेस में कभी-भी, कहीं-भी अंतहीन बहस शुरू की जा सकती है. लेकिन संसद से लेकर सड़क तक फैली इन बहसों से उन तालों की चाबियां कभी नहीं खोजी जा सकीं जो रहस्य वाले इन संदूकों के ताले खोल सकें. कई पीढ़ियों में फैले इन रहस्यों में से कुछ हास्य की परिधि में हैं, कुछ व्योमकेश बख्शी जैसे जासूसों की जरूरत याद दिलाते हैं और कुछ राहुल गांधी की शादी और उनके प्यार-व्यापार के आस-पास अपनी बाहें ऊपर चढ़ाए सालों से चक्कर काटे जा रहे हैं.

    सोनिया गांधी की गंभीर बीमारी की खबर सार्वजनिक होने पर कांग्रेस के अंदर और बाहर से उन पर यह दबाव बढ़ने का अवश्यम्भावी खतरा है कि किसी और को कांग्रेस का प्रेसीडेंट नियुक्त किया जाए

इन्हीं रहस्यों में कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें खुद कांग्रेस ने तिलिस्मी बना दिया है. कभी अपनी तथाकथित जरूरतों के चलते और कभी परिवार के प्रति अपनी वफादारी की अति दिखाने के फेर में. सोनिया गांधी की वह क्या बीमारी है जिसे पिछले पांच सालों से पूरे देश से छिपाया जा रहा है? और ऐसी क्या मजबूरी है कि उस बीमारी को इस एहतियात से छिपाना पड़ रहा है?

बात सन् 2011 की सर्दियां के आने से पहले के महीनों की है. ये इस रहस्य की कहानी के शुरूआती दिन थे और उस वक्त की कांग्रेस की सरकार की तरह सबकुछ अस्पष्ट था. काफ्का की किसी कहानी-सा. एक रोज चार अगस्त को बाहर देश के मीडिया - बीबीसी और फ्रेंच न्यूज एजेंसी एएफपी - ने एक खबर ब्रेक की. इसके बाद कांग्रेस पार्टी की तरफ से जनता के नाम एक छोटा-सा पैगाम आया - सोनिया गांधी एक मेडिकल इमरजेंसी की वजह से सर्जरी के लिए विदेश गई हैं. बस इतना ही. कुछ दिनों बाद आठ अगस्त को एक और पैगाम आया. सर्जरी सफल रही है और सोनिया जी कुछ हफ्तों में भारत लौट आएंगीं. इसके अलावा न परिवार कुछ बोला, न पार्टी और न मीडिया ही आत्मविश्वास के साथ ज्यादा कुछ कह पाया.

इसके बाद कयास लगने शुरू हुए. वे न्यूयॉर्क के एक अस्पताल में हैं. अस्पताल कैंसर के इलाज के लिए मशहूर है. लोगों ने कहा पैंक्रियाज कैंसर है. किसी ने कहा सर्वाइकल कैंसर. किसी ने पैंक्रियाज में ट्यूमर के इलाज का दावा किया. कुछ ने कहा कैंसर नहीं था बस पैंक्रियाज से संबंधित एक आपरेशन था. लेकिन ज्यादा जोर कैंसर पर ही रहा. सभी ने अपनी-अपनी जानकारी में होने वाले कैंसरों का जिक्र करना शुरू कर दिया. किसी ने गैस्ट्रोइंटैस्टाइनल कैंसर का नाम लिया तो किसी ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का होने की वजह से स्किन कैंसर का भी नाम ले लिया. खबरें आईं कि वे पिछले आठ महीने से कैंसरग्रस्त हैं और इसलिए बार-बार विदेश जा रहीं थीं. यह भी कि फर्स्ट स्टेज कैंसर था और सात घंटे लंबी सर्जरी थी. खबरों ने उनके कैंसर स्पेशलिस्ट डॉक्टर दत्तात्रेयूडू नोरी का भी जिक्र किया. यह भी कि ऑपरेशन का सारा बंदोबस्त सोनिया गांधी के पुराने विश्वासपात्र पुलक चटर्जी ने किया था. जाहिर है, इनमें से किसी भी जानकारी की सत्यता की जानकारी न तब किसी को थी और न अब हमें है. क्योंकि न कांग्रेस पार्टी ने इन खबरों का सत्यापन किया, और न गांधी परिवार ने कभी इन्हें नकारा.

    सोनिया गांधी की यह बीमारी आज भी क्यों छिपाई जा रही है इसकी एक वजह तो गांधी परिवार का प्राइवेसी को लेकर हद से ज्यादा संवेदनशील होना है, और दूसरी वजह शायद राहुल गांधी हैं

गांधी परिवार तब भी खामोश रहा जब यह सवाल बार-बार उठा कि बीमारी को इस तरह छिपाने की जरूरत क्या है. लोगों ने कहा कि लोकशाही में इस तरह देश की सबसे ताकतवर नेता के स्वास्थ्य की बात नहीं छिपाई जानी चाहिए. राजनीतिक विश्लेषकों ने अमेरिका के बिल क्लिंटन का उदाहरण दिया, जिनके हृदय रोग के ऑपरेशन का पूरा ब्यौरा अमेरीकी न्यूज चैनल जनता को दे रहे थे. हमारे उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भी उदाहरण दिया गया जिनकी 2009 के शुरूआत में ह्दय की बायपास सर्जरी हुई थी और जिसके बारे में सभी को अधिकतम जानकारी थी. ओबामा का उदाहरण भी सामने आया, जिन्होंने 2010 से अपने हेल्थ चेक-अप के नतीजों को सार्वजनिक करना शुरू किया था.

सोनिया गांधी की यह बीमारी आज भी क्यों छिपाई जा रही है इसकी एक वजह तो गांधी परिवार का प्राइवेसी को लेकर हद से ज्यादा संवेदनशील होना है, और दूसरी वजह शायद राहुल गांधी हैं. सोनिया गांधी की गंभीर बीमारी की खबर सार्वजनिक होने पर कांग्रेस के अंदर और बाहर से उन पर यह दबाव बढ़ने का अवश्यम्भावी खतरा है कि किसी और को कांग्रेस का प्रेसीडेंट नियुक्त किया जाए. किसी और का मतलब कांग्रेस में गांधी परिवार से ही कोई और होता है, और गांधी परिवार में भी तब और अब तक भी वह केवल राहुल गांधी ही हो सकते है.

लेकिन 2011 में जब यह बीमारी पब्लिक डोमेन में आई थी तब कांग्रेस चौतरफा मुसीबतों से घिरी हुई थी. उस वक्त अन्ना हजारे का आंदोलन चरम पर था, कैग कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले पर शीला दीक्षित को घेर रहा था, 2-जी घोटाले के आरोप सही सिद्ध हो रहे थे, प्रणब मुखर्जी और चिदंबरम अहम् की लड़ाई में उलझे थे और खुद राहुल भी फिर ऊंचा उड़ने में नाकामयाब हो रहे थे. उस समय कांग्रेस की जिम्मेदारी राहुल के हाथ में देना कुछ लोगों के हिसाब से सही नहीं था. और राहुल खुद भी खुद को लेकर हमेशा से इतने संशय में रहे हैं जैसे स्कूल-कॉलेज जाने वाला छात्र अपने भविष्य को लेकर रहता है.

    क्या सोनिया गांधी निकट भविष्य में उस बीमारी से पार पा जाएंगी और उत्तर प्रदेश में प्रियंका-राहुल संग वो कर जाएंगीं जो 2014 में बीजेपी कर पाई थी?

इसीलिए शायद सोनिया चार लोगों का कोर ग्रुप बना राहुल को तीन वरिष्ठ नेताओं का मजबूत सहारा देकर चुपचाप अमेरिका रवाना हो गईं थीं. उनकी अनुपस्थिति के छत्तीस दिनों में राहुल ने कुछ नहीं किया, यह सभी मानते हैं. तब से लेकर अब तक भी राहुल कुछ खास करते नहीं दिखे सिवाय ‘अरहर मोदी’ जैसे कुछ दमदार भाषणों के. क्या राहुल गांधी की वजह से ही यह बीमारी छिपाई जाती रही है, रहस्य बनती रही है, और सोनिया गांधी राहुल के लिए ही दुनिया के सामने खुद को पूर्ण रूप से स्वस्थ दिखाती रहीं हैं?

इसका भी सत्यापन न कहीं से होना था, न हुआ

इस लंबे अरसे के दौरान – अगस्त 2011 से लेकर अब तक - कांग्रेस, गांधी परिवार और उनके सलाहकारों ने इस बीमारी को इस कदर अभेद्य स्टेट-सीक्रेट बना दिया है कि जनता को थोड़ा भी अंदाजा नहीं है कि आखिर बीमारी क्या हो सकती है. उसका क्या ट्रीटमेंट लिया गया, सोनिया गांधी इलाज के लिए कहां गईं, और इसके लिए किस तरह के, कितने और किसके संसाधनों का उपयोग किया जाता रहा है? सबसे बड़ा सवाल जो एक राष्ट्रीय नेता होने के नाते सिर्फ उनके राजनीतिक करियर के लिए अहम नहीं है - राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की डोर भी इस सवाल से बंधी है, और कांग्रेस की भी - कि क्या सोनिया गांधी निकट भविष्य में उस बीमारी से पार पा जाएंगी और उत्तर प्रदेश में प्रियंका-राहुल संग वो कर जाएंगीं जो 2014 में बीजेपी कर पाई थी?

देखते हैं. अभी तो सभी को मिलकर सोनिया गांधी के जल्द स्वस्थ होने की कामना करनी चाहिए. क्योंकि मजबूत सरकार के साथ-साथ हर महान लोकतांत्रिक देश में एक मजबूत विपक्ष भी होना चाहिए.

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Published in दिल्ली
khoji Narad Team

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