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इंसान प्रकृति से कट गया है तो खुद से भी जुड़ा कैसे रह सकता है!

‘मैं विज्ञान, सितारों और प्रकृति से प्रेम करता था लेकिन तब मैं लोगों से प्यार करता था बिना जाने कि इंसान बहुत पहले ही प्रकृति से कट चुका है. हमारी भावनाएं मौलिक नहीं. हमारा प्रेम गढ़ा हुआ है. हमारे विश्वासों पर रंग चढ़े हुए है.’

यह रोहित वेमुला के उस पत्र का एक अंश है जो उन्होंने आत्महत्या के ठीक पहले लिखा. उनके पत्र के इस अंश में एक युवा मन की छहपटाहट है. यह कितनी नई और कितनी पहचानी हुई भी है! प्रकृति की तरह स्वाभाविक होने की इच्छा लेकिन इस अहसास का तीखापन कि हम सब मनुष्य प्रकृति-च्युत प्राणी हैं? कि हमारा दुबारा प्राकृतिक होना नामुमकिन है? इसीलिए हम आदिवासी समाज को कई बार ईर्ष्या से देखते हैं. वे हमें किसी भूले सपने की याद दिलाते हैं, उस अवस्था की जो हमारी हो सकती थी लेकिन अब हमने खुद को जिसके नाकाबिल बना दिया है? और क्या इसी वजह से हम उनके प्रति एक खूनी नफरत से भर उठते हैं, उन्हें उनके आदिवासीपन से आज़ाद कराने के लिए हर कुछ करते हैं.

इंसान प्रकृति का अंग है, सितारों, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, वनस्पति या नदी, समंदर अथवा पहाड़ की तरह, इसे स्वीकार करना इतना आसान न था. वह खुद को सबसे अलग और विलक्षण मानता था तो उसके पीछे यह धारणा भी थी कि यह धरती ही ब्रह्मांड का केंद्र है.

ब्रूनो, गैलीलियो और डार्विन ने मनुष्य और पृथ्वी के केन्द्रिक विचार को धक्का दिया. ब्रूनो ने बताया कि यह विश्व कोई अपवाद नहीं है, ढेर सारी दुनियाओं का एक हिस्सा भर है. उसे इस ख्याल से बाज आने को कहा गया और आखिरकार इस पाप के लिए जलाकर मार डाला गया.

गैलीलियो ने जब सितारों को करीब से देखा और सूरज पर धब्बे पाए, साथ ही यह खबर इस पृथ्वीवासियों को दी कि सिर्फ उनकी धरती के इर्द-गिर्द चांद नहीं घूमता, बृहस्पति के चांद भी हैं. जैसे धरती विलक्षण नहीं, वैसे ही इंसान कोई खुदा की अकेली संतान नहीं. यह डार्विन ने इतने विस्तार से बताया कि इंसान उसी समूह का हिस्सा है, जिसमें मछली, बंदर, छिपकिली और गीदड़ हैं कि अब उससे अलग कुछ सोचना संभव नहीं.

    इक़बाल ने एक ज़र्रे में कायनात की बात की या दर्शन ने अणु में ब्रह्मांड के दर्शन किए तो उसके पीछे विज्ञान की यह खोज भी थी कि हम सबके भीतर वस्तुतः वे ही परमाणु नृत्य कर रहे हैं जो एक कुत्ते या सूअर या पेड़ को जिलाए और टिकाए हुए हैं

यह मानना लेकिन इतना आसान भी न था. ब्रूनो, गैलीलियो के साथ जो सलूक उनके हमवक्तों ने किया, हम जानते हैं. वैज्ञानिक जे ब्रोनोवस्की ने अपनी छोटी सी किताब, ‘आदमी की पहचान’ में इस संघर्ष की बानगी देते हुए जॉन टिनडेल के उस वक्तव्य को उद्धृत किया है जो उन्होंने ब्रिटिश अकेडमी फॉर द अडवांसमेंट ऑफ साइंस के अध्यक्ष के तौर पर 1874 में वैज्ञानिकों की एक बैठक में दिया. इस वक्तव्य को इसलिए भी पढ़ना ज़रूरी है कि हमारे स्कूलों में और आगे विज्ञान को भाषा का मामला माना ही नहीं जाता. वे कहते हैं:

‘मैं वहां यकायक नहीं रुक सकता जहां से हमारा माइक्रोस्कोप हमारी मदद करना बंद कर देता है. यहां हमारे मस्तिष्क की दृष्टि दृढ़ता से हमारी बाह्य दृष्टि की जगह ले लेती है. मैं उस आवश्यकता से प्रेरित और बाध्य हूं जो विज्ञान ने ही पैदा की है और जिसका उसने पोषण किया है. मैं प्रयोगजन्य प्रमाण से परे जाता हूं. सारे पदार्थमय जगत के सृष्टा के प्रति अपनी घोषित भक्ति के बावजूद हम जिस पदार्थ को ही तुच्छ मानते हैं मैं उसी में इस ब्रह्मांडीय जीवन की सारी संभावनाओं और क्षमता के दर्शन करता हूं.’

इस वक्तव्य के चार दिन बाद लंदन के एक व्यापारी ने सत्रहवीं सदी के एक क़ानून के तहत जॉन टिनडेल पर दूषण या ईश निंदा के लिए मुकदमा चलाने की अर्जी दी.

इक़बाल ने एक ज़र्रे में कायनात को देखने की बात अगर की या दर्शन ने अणु में ब्रह्मांड के दर्शन किए तो उसके पीछे विज्ञान की यह खोज भी थी कि हम सबके भीतर वस्तुतः वे ही परमाणु नृत्य कर रहे हैं जो एक कुत्ते या सूअर या पेड़ को जिलाए और टिकाए हुए हैं. बिल ब्राइसन ने इसे बहुत दिलचस्प तरीके से यों कहा है:

‘हम क्या हैं? इसे इस तरह समझें कि एक ख़ास इत्तफाकिया लम्हे में दो लोग जब एक-दूसरे से मिलते हैं तो जो चीज़ पैदा होती है, वह लाखों-लाख अणुओं का एक विशेष संयोजन या एक दूसरे के साथ एक लंबे समय तक एक विशेष शक्ल में बंधे रहने के फैसले का ही नतीजा है. फर्ज कीजिए, इन सबके बीच का यह तालमेल और समझौता टूट जाए तो फिर हम जो इतने ठोस जान पड़ते है, बिखर ही तो जाएंगे!

    मन रासायनिक क्रियाओं और आणविक संयोजनों से अलग है. मन या मेरापन बहुत कुछ मेरे परिवेश का अंग है. उसमें काफी कुछ ऐसा है जो मैंने सिरजा है, अपनी तरह से

अणुओं का यह नृत्य या संयोजन यांत्रिक है. वह एक चट्टान या तारे या वनस्पति और मुझमें एक ही नियम से काम करता है. ब्रोनोवस्की लिखते हैं कि इस तथ्य से हमारे अहं को ठेस पहुंचती है. अगर यह ठीक है तो फिर मेरा मैं क्या है!

जैसा कि विज्ञान बताता है कि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से भिन्न भी है. यह उसकी रासायनिक संरचना के कारण भी है. आपके शरीर की चमड़ी उतर जाए तो उस पर किसी और की चमड़ी का प्रत्यारोपण नहीं हो सकता. आपकी देह के ही दूसरे हिस्से से निकालकर उपचार करना होगा. हम जानते हैं कि गुर्दा खराब होने पर हर किसी का गुर्दा हमारी देह कबूल नहीं करेगी.

रोहित ने अपने पत्र में इस पर भी अफ़सोस जाहिर किया कि इंसान की कीमत उसकी फौरी पहचान में शेष कर दी गई है और उसे एक मन के तौर पर समझने की कोशिश नहीं की जाती. यह मन रासायनिक क्रियाओं और आणविक संयोजनों से अलग है. मन या मेरापन बहुत कुछ मेरे परिवेश का अंग है. उसमें काफी कुछ ऐसा है जो मैंने सिरजा है, अपनी तरह से. इसलिए मैं किसी फतिंगे या बारिश की तरह प्रत्याशित नहीं हूं. आप मेरे बारे में एक हद तक ही अनुमान लगा सकते हैं. आप मेरे हर फैसले का अंदाज नहीं कर सकते. इसे वैज्ञानिकों ने कहा - मनुष्य समझ लिए जाने के विरुद्ध एक पहेली बने रहना चाहता है.

इसलिए आप यह भी न चाहें कि मैं आपकी पकड़ में आ जाऊं, या बिलकुल आपके जैसा ही हो जाऊं तभी आपके-मेरे बीच एक इत्मीनान का रिश्ता हो सकता है. दूसरे शब्दों में मेरा पूरा अर्थ आपकी समझ में आ जाए या मुझमें आपमें कोई भेद ही न रहे, यह एक विकृत कामना है. हर किसी को अपना बनाने के बहाने अपने में मिला लेने के लोभ पर संयम रखना एक जरूरी मानवीय सावधानी है.

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khoji Narad Team

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