उत्तराखंड

rudrpraygरुद्रप्रयाग। शुक्रवार देर रात्रि ग्राम पंचायत पीड़ा धनपुर के खैरपाणी तोक में रात्रि साढ़े दस बजे सभी लोग सो चुके थे। इस दौरान अचानक पत्थरों की तेज आवाजे आई। ग्रामीणों ने बाहर आके देखा दो आवासीय भवन और दो गौशालाओं मलबे में दब गई थी। पहाड़ी से अचानक आया जलजला सबकुछ अपने साथ बहा के ले गया। गौशाला के अंदर बंधी प्रभावित मोहन सिंह पुत्र बुद्धि सिंह की दो भैंस, एक बछड़ा और एक बैल भी मलबे में जिंदा दफन हो गये। अचानक बादल फटने से चारों ओर अफरा-तफरी मच गई। आस-पास के लोग एकत्रित हुये और सुरक्षित स्थानों की ओर भागे। बादल फटने की घटना के बाद अब अन्य परिवारों पर भी खतरा मंडराने लगा है। कई आवासीय भवन खतरे की जद में आ गये हैं। प्रभावित परिवार जैसे-तैसे रह रहे हैं। लोगों के आवासीय भवनों के भीतर से पानी की धारा फूट रही हैं। रात के समय अचानक गौशाला और आवासीय भवन के पीछे से बादल फटने से मलबे और बोल्डरों ने गौशाला को ही अपनी चपेट में लिया। जो आवासीय भवन आपदा की चपेट में आये, उनमें रात्रि के समय कोई नहीं था। अन्यथा एक जनहानि भी हो सकती थी। बादल फटने के कारण दयाल सिंह पुत्र फते सिंह का चार कमरों वाला मकान पूर्णत: ध्वस्त हो गया। जबकि मोहन सिंह की गौशाला और उसमें बंदी दो भैंस, एक बैल, और एक बच्छड़ा मलबे में जिंदा दफन हो गये। पुष्कर सिंह रमेश सिंह के आवासीय भवन को आंशिक क्षति पहुंची है। प्रभावित मोहन सिंह ने कहा कि गौशाला के साथ ही गौशाला में बंधे मवेशियों के मलबे में जिंदा दफन होने से उनके सम्मुख आजीविका का संकट गहरा गया है। वह किसी तरह दूध बेचकर अपना गुजारा करते थे, लेकिन आपदा उनका सबकुछ बहा कर ले गई। वहीं दयाल सिंह, पुष्कर सिंह और रमेश सिंह ने कहा कि आवासीय भवनों के आपदा की चपेट में आने से जीवन यापन का संकट पैदा हो गया है। बारिश होते ही वह किसी तरह से रात्रि काट रहे हैं। कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। उन्होंने प्रशासन से सुरक्षित स्थानों पर विस्थापन करने की मांग की है। पीड़ा गांव में बादल फटने की घटना के बाद से ही बिजली आपूर्ति भी ठप पड़ी है। बिजली पोलों के क्षतिग्रस्त होने से ग्रामीणों के सामने दिक्कतें बढ़ गई हैं। अब ग्रामीणों को रात अंधेरे में ही काटनी पड़ेगी। सूचना मिलने पर राजस्व उप निरीक्षक मनोज असवाल घटना स्थल पर पहुंचे और मौका-मुआयना करके प्रभावित को उचित मुआवजा देने का आश्वासन दिया। बाद में उप जिलाधिकारी मुक्ता मिश्र भी गांव में पहुंची। उपजिलाधकारी ने कहा कि प्रभावित शीघ्र ही अहेतुक राशि दी जायेगी। खतरे की जद में आये परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर रहने की सलाह दी गई है।

swine flun

देहरादून। सरकारी इंतजामों को स्वाइन फ्लू लगातार चुनौती दे रहा है। स्वास्थ्य विभाग ने इसे लेकर अलर्ट जरूर जारी किया है, लेकिन इसका असर होता नहीं दिख रहा। इस बीमारी के दो और संदिग्ध मरीजों की मौत हो गई। इनका हिमालयन अस्पताल जौलीग्रांट में इलाज चल रहा था। एक मरीज ऋषिकेश और दूसरा हरिद्वार के ज्वालापुर का रहने वाला था। इनकी मौत से स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। स्वाइन फ्लू का कहर लगातार बढ़ता जा रहा है। जनपद देहरादून में इस साल स्वाइन फ्लू से छह मरीजों की मौत हो चुकी है। गुरुवार को दो और संदिग्ध मरीजों की मौत हो गई। इनमें ऋषिकेश निवासी मरीज की उम्र 54 वर्ष, जबकि हरिद्वार निवासी शख्स की उम्र 42 साल थी। इन दोनों को ही 15 जुलाई को अस्पताल में भर्ती कराया गया था और डॉक्टरों के मुताबिक दोनों में स्वाइन फ्लू के लक्षण पाए गए थे। मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. तारा चंद पंत ने बताया कि मरीजों में स्वाइन फ्लू के लक्षण थे, इसलिए दोनों के सैंपल एनसीडीसी दिल्ली भेजे गए हैं। जिनकी अभी रिपोर्ट नहीं आई है। डॉ. पंत ने बताया कि अस्पतालों को अलर्ट रहने के निर्देश दिए गए हैं। सभी अस्पतालों को कम से कम 10 बेड का स्वाइन फ्लू और डेंगू वार्ड बनाने का निर्देश दिया गया है। प्रदेश में स्वाइन फ्लू का कहर लगातार जारी है। इस साल अब तक 80 मरीजों के सैंपल एनसीडीसी दिल्ली भेजे जा चुके हैं, जिनमें से 22 मरीजों में स्वाइन फ्लू की पुष्टि हुई। स्वाइन फ्लू से सात मरीजों की मौत भी हो चुकी है। स्वास्थ विभाग अभी इस समस्या से जूझ ही रहा था कि डेंगू ने भी दोहरा मोर्चा खोल दिया है। मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. तारा चंद पंत ने बताया कि सभी अस्पतालों को दोनों बीमारियों के लिए अलग-अलग वार्ड बनाने के निर्देश दिए गए हैं। कोई भी संदिग्ध मामला आने पर तुरंत बताने को कहा गया है। डेंगू से बचाव के लिए शहर में फॉगिंग कराई जा रही है। स्वास्थ्य विभाग को राजधानी देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जिले के कई क्षेत्रों में डेंगू फैलाने वाले एडीज मच्छर का लार्वा मिला है। एडीज के लार्वा को मच्छर बनने में लगभग एक सप्ताह लगता है। 20 से 40 डिग्री का तापमान इस मच्छर के लिए खासा उपयुक्त है। राज्य में मानसून की वजह से लगातार बारिश हो रही है और इससे शहरी क्षेत्रों में जलभराव की स्थिति बनी हुई है। जो डेंगू मच्छर के लिए मददगार है।

p1 मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से शुक्रवार को मुख्यमंत्री आवास में आई.जी., आई.टी.बी.पी. श्री एच.एस.गोराया तथा डी.आई.जी. श्री संजीव रैना ने शिष्टाचार भेंट की।  (सू.वि.)

mjमसूरी,जिसने 19 वीं सदी के अंत में समूचे पूर्वी एशिया को स्केटिंग जैसा बेहतरीन खेल दिया,आज उसी शहर में इस खेल का कोई कद्रदान न रहा।सीजन की बेइन्तहा भीड है,पर इस हिल स्टेशन में स्केटिंग का शौक फरमाने वाला न एक टूरिस्ट और न एक भी स्थानीय खिलाडी।अभी शाम के वक्त 1990 के मध्य दशक तक पर्यटक और लोकल स्केटिंग खिलाडियों से भरा रहने वाले विशालकाय "द रिंक" हाल में दूर दूर तक सन्नाटा पसरा है,और हाल का कर्मी स्केटर की राह तकते तकते अभी शाम के 7 बजे हाल के गेट पर ताला जड के जा रहा है।सूनी सी सीडियों के पास के बिलियर्ड रूम पर तो कई साल से ताला पडा है।बिलियर्ड भी 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश फौजियों के साथ लंदन और डबलिन से सीधा देश में सबसे पहले मसूरी पहुँचा था।वह 1958 का साल था,जब बचपन में सबसे पहले बेवरली कान्वेट के प्राईमरी छाञ के रूप में अपने स्कूल समूह के साथ मैं द रिकं में पहली बार स्केट पहन कर इसके नार्वेयिन लकडी चमकदार फर्श पर उतरा था।1960 के दशक के दिनों में हमारे माँ-बाप हमें प्रोत्साहित करते थे-"जाओ स्केटिंग खेल में स्पीड व प्रतिस्पर्धा में दूसरे स्केटरों से आगे निकलो।"उन दिनों द रिकं और मालरोड पर स्टेण्डर्ड रिकं(स्टीफल्स हाल) हमारे प्रिय खेल स्थल थे।स्टेण्डर्ड हमारे सामने 1967 में अग्निकाण्ड से स्वाह हुआ और मसूरी की एक भव्य विरासत खत्म हुई।1970 के मध्य दशक में "द रिंक" से मेरी कई मधुर यादे बाबस्ता हैं,नाटकों में रोल प्ले से लेकर कालेज दिनों में अपनी प्रियत्तमा की प्रतिक्षा तक।मुझे याद है 1975 में रेडियो नाटक "अण्डर सेकेट्री" के बूराराम रोल के लिए मुझे मसूरी शरदोत्सव समिति ने उस साल का "बेस्ट एक्टर आफ मसूरी"चुना था।शुरू में पूर्वी एशिया के सबसे बडे स्केटिगं हाल/प्रेक्षाग्रह "द रिंक" का स्वामी शिकारी विल्सन का बडा बेटा था,जिसने इस खेल में पहाड के अनेकों नौजवानों को ख्याति दिलायी।मसूरी में स्केटिंग जैसी खेल विधा को पैदा करने वाले शहर से इस खेल का अंत होना दुखदायी है।कभी वार्सिलोना ओलम्पिक की रोलर हाकी के चीफ रैफरी स्व• नन्दकिशोर भम्बू और अनेक देश-विदेश के ख्यातिप्राप्त स्केटर इसी हाल के फर्श से ऊंचाई पर पहुँचे थे।वैसे ये क्रिकेट के अलावा सभी भव्य खेलों के अंत का अजीब दौर है।अब मसूरी सीजन में शेयर और ताश के बडे खिलाडी आते हैं-जो जिम में जाकर अपनी मोटी तौन्द कमतर करने की असफल कोशिश करते हैं और उनके थुलथुले बच्चे वीडियो गैम्स की दुकानों पर युद्ध के कृञिम सीन पर फुदकते दिखते हैं/वाकई जमाना बडा ऊटपटांग हो चला है ?   

                                                                                                           जयप्रकाश उत्तराखण्डी 
                                                                                                               (हिस्टोरियन)

                                                                                                                                       

                                                                                                                                                         

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